‘गहरे पानी पैठ’ 1
सर्व श्री राजबल्लभ जी एवं डॉ. मित्तल जी ने उकसाया कि राजनीति की व्यापक उलझनों एवं उसे सुलझाने के सूत्र ढूंढने के लिए गहरे पानी में जाना होगा। पता नहीं वे स्वयं उतरे या नहीं? और, उतरे तो उन्होंने क्या पाया? कितना सार्थक, कितना नया और बहुमूल्य? खैर, मुझे क्या मिला यह बता रहा हूं, कितनी गहराई वाला और कैसा है? इस पर विचार करना आप सबों का काम है।
आगे से कुछ दिनों तक ‘‘गहरे पानी पैठ’’ इसी नाम से कुछ बातें रखूंगा।
1 यह संसार उलझनों से भरा है। किसी ने कहा संसार का दूसरा नाम उलझन है, तो क्या उलझि-उलझि मर जाना है? नहीं, उलझनों को सुलझाना और संबंधों के सूत्रों से नयी चादर बुनना जीवन का लक्ष्य है। इसमें रचनात्मकता के साथ उपलब्धि तथा भोग का सुख भी है, न्यूनतम अपरिहार्य दुख के साथ।
2 राजनीति की दृष्टि से ऐसी कौन सी बात है, जो गहरे में सबको उलझाए हुए है? इसे परत दर परत खोजते-खोजते मामला यहां तक गया कि राज्य की संप्रभुता की अवधारणा में ही गड़बड़ी है, तब शासन का कोई भी रूप लोकपक्षीय कैसे हो सकेगा? अतः इसकी पुनः व्याख्या की जरूरत है।
3 लोकतंत्र केवल चुनावतंत्र नहीं है। तब होना क्या चाहिए, इस पर प्रस्ताव भी तो लाना होगा? किसी न किसी को पहल करनी होगी।
4 नैतिकता और वैधता का सवाल उभरा। आखिर इसका आधार क्या होगा? कौन तय करेगा इसे? संप्रभु राज्य, विभिन्न प्रकार के ईश्वर, उनके सांसारिक प्रतिनिधि, जैसे- नबी, पैगंबर, मुनि, ऋषि, बुद्ध आदि और उनकी बातों के व्याख्याकार अनेक धर्माचार्य? या आज के टेक्नोक््रेट, विकासवादी, स्वयंभू नैतिकतावादी अथवा बाजार और युद्ध के नियामक?
5 क्या इनसे अलग, इनकी पकड़ से अलग, नैतिकता और वैघता की कोई समझ उपलब्ध है? यदि है, तो उस पर भी विचार कर मिलाना होगा कि सच में अलग है या पुराने का ही नया नाम दिया हुआ नया संस्करण है।
6 मुझे 2 अन्य प्रकार मिले- प्रकृतिवादी, जो जीवों के व्यवहार में नैतिकता का आधार मानते हैं और दूसरे जो मानव समुदाय-समाज में नैतिकता का आधार मानते हैं। पहले वालों की बातों में संगति, विसंगति तथा उलझनें प्रगट होती हैं। दूसरे वालों में 2 प्रकार हैं- एक जो विभिन्न क्षेत्रों, समुदाय-समाज के नैतिकता-वैधता के पैमानों में विरोध होने पर सामंजस्य को आधार मानते हैं और दूसरे जो इस विरोध पर स्वयं पंचायती एवं अंतिम प्रामाणिक निर्णय का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखना चाहते हैं। कोई डार्विन के सिद्धांत को आधार मान कर परस्पर संघर्ष के सिद्धांत को निर्णायक बता रहा है तो कोई चींटी, मक्खी हाथी आदि की सामुदायिकता का सिद्धांत प्रस्तुत कर रहा है। भारतीय पुराने व्यवसायी मधुकरी वृत्ति- भौंरों के परागन तथा मधु संचय वाले सिद्धांत पर अपने को सही ठहराते रहे हैं कि हमारे बिना तो संसारिक सृष्टि ही आगे न बढ़े।
7 नये लोगों में कुछ लोग, मर्द-औरत दोनो ही इस बात का प्रचार कर रहे हैं कि सारी समस्या पुरुष की दृष्टि और सत्ता में है। अतः फिर से मातृसत्ता लायी जाए, समाधान स्वतः हो जायेगा। इन्हें औरतों के बीच झगड़ा न नजर आता है, न मातृप्रधान समाज की गडबडियां।
8 कुछ लोगों को भले ही लगे कि ये सब नयी बातें हैं लेकिन मेरी जानकारी में भारत में भी इतनी कबायद बहुत पहले हो चुकी। एक नीतिकार लिख गये- आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च, सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्। आहार-निद्रा-भय-मैथुन पशु एवं मनुष्य में समान हैं। राजनीति इतने से चलती नहीं तो फिर पेंच फंसायी- ‘ज्ञानो/धर्मो हि तेषाम् अधिको विशेषो’ मतलब मनुष्य में खाशियत यह है कि ज्ञान/धर्म उसमें पाया जाता है। हो गया सारा कबाड़ा। अब ज्ञान एवं धर्म के नाम पर सारी मिलावटी-आततायी बातें मनुष्य पर थोपी जा सकती हैं, जिससे पशु तो कम से कम जरूर बचे हुए हैं।
9 प्रकृति में कुछ घटनाएं स्वतः घटती हैं, आप कोई हस्तक्षेप करें या न करें। प्रकृति अपने ही गतिशील है। सृष्टि, स्थिति और ध्वंस निरंतर चलता रहता है। उसने जीवों के लिए, कुछ उनकी मर्जी से करने के लिए संभावनाएं भी छोड़ी हैं। जो जीव उन संभावनाओं का जितना ज्ञान प्राप्त करे और उसके बल पर नयी, मतलब जो प्रकृति में स्वयं नहीं होती, वैसी रचना करता रहता है। चिडि़या घोसले बनाती है तो मानव छोटे-बड़े मकान वगैरह। माडर्न सायंस कम मायावी नहीं है। इसके साथ टेक्नोलोजी ने अनेक प्रकार की ऐसी रचानाएं की हैं, जो मूलतः प्रकृति की सामान्य क्रियाओं से स्वतः नहीं बनतीं। न रेल बनती, न हवाई जहाज या ऐसी अनेक चीजें। माडर्न सायंस-टेक्नोलोजी इतनी प्रभावी है कि वह मानवता, लोकतंत्र, धर्म के अनेक रूप, समाज संरचना, सामुदायिक व्यवस्थाएं, किसी की सीमा-मर्यादा को नहीं मानती। ऐसे में किसे पकड़ें, किसे छोड़ें?
आगे से कुछ दिनों तक ‘‘गहरे पानी पैठ’’ इसी नाम से कुछ बातें रखूंगा।
1 यह संसार उलझनों से भरा है। किसी ने कहा संसार का दूसरा नाम उलझन है, तो क्या उलझि-उलझि मर जाना है? नहीं, उलझनों को सुलझाना और संबंधों के सूत्रों से नयी चादर बुनना जीवन का लक्ष्य है। इसमें रचनात्मकता के साथ उपलब्धि तथा भोग का सुख भी है, न्यूनतम अपरिहार्य दुख के साथ।
2 राजनीति की दृष्टि से ऐसी कौन सी बात है, जो गहरे में सबको उलझाए हुए है? इसे परत दर परत खोजते-खोजते मामला यहां तक गया कि राज्य की संप्रभुता की अवधारणा में ही गड़बड़ी है, तब शासन का कोई भी रूप लोकपक्षीय कैसे हो सकेगा? अतः इसकी पुनः व्याख्या की जरूरत है।
3 लोकतंत्र केवल चुनावतंत्र नहीं है। तब होना क्या चाहिए, इस पर प्रस्ताव भी तो लाना होगा? किसी न किसी को पहल करनी होगी।
4 नैतिकता और वैधता का सवाल उभरा। आखिर इसका आधार क्या होगा? कौन तय करेगा इसे? संप्रभु राज्य, विभिन्न प्रकार के ईश्वर, उनके सांसारिक प्रतिनिधि, जैसे- नबी, पैगंबर, मुनि, ऋषि, बुद्ध आदि और उनकी बातों के व्याख्याकार अनेक धर्माचार्य? या आज के टेक्नोक््रेट, विकासवादी, स्वयंभू नैतिकतावादी अथवा बाजार और युद्ध के नियामक?
5 क्या इनसे अलग, इनकी पकड़ से अलग, नैतिकता और वैघता की कोई समझ उपलब्ध है? यदि है, तो उस पर भी विचार कर मिलाना होगा कि सच में अलग है या पुराने का ही नया नाम दिया हुआ नया संस्करण है।
6 मुझे 2 अन्य प्रकार मिले- प्रकृतिवादी, जो जीवों के व्यवहार में नैतिकता का आधार मानते हैं और दूसरे जो मानव समुदाय-समाज में नैतिकता का आधार मानते हैं। पहले वालों की बातों में संगति, विसंगति तथा उलझनें प्रगट होती हैं। दूसरे वालों में 2 प्रकार हैं- एक जो विभिन्न क्षेत्रों, समुदाय-समाज के नैतिकता-वैधता के पैमानों में विरोध होने पर सामंजस्य को आधार मानते हैं और दूसरे जो इस विरोध पर स्वयं पंचायती एवं अंतिम प्रामाणिक निर्णय का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखना चाहते हैं। कोई डार्विन के सिद्धांत को आधार मान कर परस्पर संघर्ष के सिद्धांत को निर्णायक बता रहा है तो कोई चींटी, मक्खी हाथी आदि की सामुदायिकता का सिद्धांत प्रस्तुत कर रहा है। भारतीय पुराने व्यवसायी मधुकरी वृत्ति- भौंरों के परागन तथा मधु संचय वाले सिद्धांत पर अपने को सही ठहराते रहे हैं कि हमारे बिना तो संसारिक सृष्टि ही आगे न बढ़े।
7 नये लोगों में कुछ लोग, मर्द-औरत दोनो ही इस बात का प्रचार कर रहे हैं कि सारी समस्या पुरुष की दृष्टि और सत्ता में है। अतः फिर से मातृसत्ता लायी जाए, समाधान स्वतः हो जायेगा। इन्हें औरतों के बीच झगड़ा न नजर आता है, न मातृप्रधान समाज की गडबडियां।
8 कुछ लोगों को भले ही लगे कि ये सब नयी बातें हैं लेकिन मेरी जानकारी में भारत में भी इतनी कबायद बहुत पहले हो चुकी। एक नीतिकार लिख गये- आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च, सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्। आहार-निद्रा-भय-मैथुन पशु एवं मनुष्य में समान हैं। राजनीति इतने से चलती नहीं तो फिर पेंच फंसायी- ‘ज्ञानो/धर्मो हि तेषाम् अधिको विशेषो’ मतलब मनुष्य में खाशियत यह है कि ज्ञान/धर्म उसमें पाया जाता है। हो गया सारा कबाड़ा। अब ज्ञान एवं धर्म के नाम पर सारी मिलावटी-आततायी बातें मनुष्य पर थोपी जा सकती हैं, जिससे पशु तो कम से कम जरूर बचे हुए हैं।
9 प्रकृति में कुछ घटनाएं स्वतः घटती हैं, आप कोई हस्तक्षेप करें या न करें। प्रकृति अपने ही गतिशील है। सृष्टि, स्थिति और ध्वंस निरंतर चलता रहता है। उसने जीवों के लिए, कुछ उनकी मर्जी से करने के लिए संभावनाएं भी छोड़ी हैं। जो जीव उन संभावनाओं का जितना ज्ञान प्राप्त करे और उसके बल पर नयी, मतलब जो प्रकृति में स्वयं नहीं होती, वैसी रचना करता रहता है। चिडि़या घोसले बनाती है तो मानव छोटे-बड़े मकान वगैरह। माडर्न सायंस कम मायावी नहीं है। इसके साथ टेक्नोलोजी ने अनेक प्रकार की ऐसी रचानाएं की हैं, जो मूलतः प्रकृति की सामान्य क्रियाओं से स्वतः नहीं बनतीं। न रेल बनती, न हवाई जहाज या ऐसी अनेक चीजें। माडर्न सायंस-टेक्नोलोजी इतनी प्रभावी है कि वह मानवता, लोकतंत्र, धर्म के अनेक रूप, समाज संरचना, सामुदायिक व्यवस्थाएं, किसी की सीमा-मर्यादा को नहीं मानती। ऐसे में किसे पकड़ें, किसे छोड़ें?
सुविधा की दुविधा यह फंसी है कि जैसे ही हम माडर्न सायंस के आविष्कार, जैसे- सड़क-मोटर यान, रेल-हवाई जहाज से सफर जारी रखना चाहेंगे किसानों भू मालिकों से जमीन लेनी ही होगी, उनकी मर्जी हो या न हो। शासन का कोई भी माडल क्या बिना भूअर्जन के सड़कें या मिलें बना सकेगा? खनिजों की खुदाई बिना विस्थापन के हो सकेगी? दरसल मामला और गहरे में फंसा है- मनुष्य एवं प्रकृति के संबंधों में। जब तक उस गहराई में जा कर समाधान नहीं ढूंढा जायेगा, तब तक शासन का न सही माडल बन पायेगा न ही विकास का, न मौलिक अधिकार का, न ही राज्य का।
तब फिर??? फिर बेताल को डाल पर से उतारना होगा। इसके लिए साधना करनी होगी, उसके लिए कुछ समय दिया जाए? कुछ आप अपने भंडार से निकालिए।
तब फिर??? फिर बेताल को डाल पर से उतारना होगा। इसके लिए साधना करनी होगी, उसके लिए कुछ समय दिया जाए? कुछ आप अपने भंडार से निकालिए।
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