Thursday, 13 April 2017

करना क्या है?


Ravindrakumar Pathak
प्रश्न आया है कि सामाजिक-राजनैतिक उलझनों की समझ के बाद या उसके साथ करना क्या है?
वैसे तो हमने अपने घोषणा पत्र में लिखा है कि हम क्या क्या करना चाहते हैं। उसके साथ यह भी कि अनेक नयी बातों को सीखने-जोड़ने के लिए भी तैयार हैं।
विखंडन, घृणा, असहिष्णुता, आक्रोश, बदला, जीत, वर्चस्व हमारा लक्ष्य नहीं है। न हम ऐसे अतिवादी या ढोंगी हैं कि कहें कि हम आक्रमण पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं करेंगे। एक सीमा तक सहना और तालमेल बनाना मैत्री आदि गुणों के विकास के लिए जरूरी है लेकिन सर्वस्व समर्पण तो आधुनिक युग के अहिंसा पर प्रयोग करने वाले महात्मा गांधी ने भी नहीं स्वीकार किया अन्यथा आजादी की मांग ही अप्रासंगिक हो जाती।
इसलिए हमारे सामने एकता की राजनीति में आत्मीयता, मैत्री आदि भावनाओं के विकास हेतु रचनात्मक कार्यक्रमों की समझ तथा नये प्रासंगिक कार्यक्रम गढ़ने और जीने की भी चुनौती है। इसके बगैर हमारा प्रयास अविश्वसनीय बौद्धिक कबायद भर हो कर रह जायेगा। भरसक ऐसा तो हम होने न देंगे।
सीधे कार्यक्रमों के प्रस्ताव के पहले हम जरा एक बार पता करने की कोशिश तो कर लें कि इसमें अभी क्या संभावनाएं हैं।
समाज में स्नेह, प्रेम, पारस्परिकता, अपनापन आदि गुण जितना बचा है, उसका समर्थन करना सबसे पहले जरूरी है, बशर्ते कि वह अपनी कीमत पर हो। दूसरे की संपत्ति के दान करने वाले बहुत होते हैं। आढ़त में धर्मादा जोड़ कर गोरक्षिणी चलाने या अरब के पैसे पर हिन्दुस्तान में यतीमखाना चलाना और स्थानीय सहभागिता को नकारना, धर्मांतरण की शर्त और योजना के साथ अस्पताल स्कूल चलाना या ऐसे अन्य कार्य बड़े ही उलझाने वाले होते हैं। इन्हें ठीक से समझना भी होगा। नागरिकों की खुशी से अलग राष्ट्र, सर्वहारा की तानाशाही जैसे अनेक जुमले आज की चलन में हैं। इनमें से झूठ सच को अलग कर सच के पक्ष में खड़ा होना होगा। गोरक्षिणी नहीं गोवंश नस्ल सुधार वह भी नागरिकों की पहल से या राज्य के द्वारा, अपने धन से दान, देशी चंदे से यतीमखाना और बिना भूतप्रेत का भ्रम फैलाये, बिना धर्मांतरण की शर्त के मिशनिरी क्रिया कलाप, बिना दबाव घर वापसी आदि सभी अच्छे हैं। देश के कमजोर और गरीब को प्राथमिकता देने वाले विकास के सरकारी कार्यक्रम ऐसे अनेक उदाहरण हो सकते हैं। मामला गड़बड़ तब है जब कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना हो। हमें ऐसा नहीं करना।
हमने तो अभी शुरुआत की हैं, हम न पार्टी हैं, न राज्य, न सरकार। अतः तत्काल तो बस हम आपकी म्रगल कामना कर सकते हैं। जैसे ही हमारा संगठनात्मक रूप बनने लगेगा। हम एक से एक दिल लूटने वाले कार्यक्रम ले कर आपके पास हाजिर होंगे। तब तक दिमागी कसरत कर लेते हैं।
आज न 1942 की स्थिति है न 1947-48 की। इस बीच बहुत कुछ बदल गया। अतः आज की तारीख में प्रेम, करुणा, दोश्ती के नये तरीके इजाद करने ही होंगे। यह सब आज के संदर्भ में करना होगा। छूआछूत पहले जैसा नहीं हैं, न ही दलितों की वह हालात है। सवर्णों की दशा भी बदली है। चुनावी उठापटक के नये नये पैंतरे चलन में आ गये हैं। अंतर्जातीय विवाह की चलन बढ़ रही है। शहरीकरण तेजी में है। ये सारी बातें क्या प्रगट नहीं हैं।
विकट समस्या समझ के साथ चालाकी के अधिक बढ़ जाने और विखंडित व्यक्तित्व की अधिक है। विचार की राजनीति तेजी से समाप्त हो रही है। आर्थिक नीतियों के मामले में 2 बड़े राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा एक हैं और अन्य अनेक दल भी कमोबेश उन्हीं नीतियों के समर्थक हैं। पुराने सामंतवाद की जगह नवसामंतवाद स्थापित हो रहा है। नव धनाढ्यों की राजशाही की नकल बहुत कुछ कह रही है।
बस सबसे पहले मिलावट से बच कर सीधी बात कहने की हिम्मत जुटानी और आपसी अपनापन के प्रस्ताव की सच्चाई पर खरा उतरना। यही सरल राजनीति है। इसके लिए कुछ मोटे नियम बन सकते हैं। भाव असली होता है, नियम तो सहायता करते हैं। निजी जीवन एवं अपने चिंतन में दूरी गलती से भले रह जाए, अपेक्षित नहीं है। हां एक बात साफ कि लक्ष्य और वर्तमान के बीच क्रमबद्ध संगति होती है, सीधी नहीं। अतः यह किसी से आशा नहीं की जा सकती कि किसी भावी योजना या लक्ष्य से सहमत व्यक्ति तुरत उसी प्रकार से जीना शुरू कर दे। फिर भी क्रमबद्धता तो माननी होगी ही वरना ऐसी समझ पाखंड हो जायेगी।
आगे हम ऐसे कुछ व्यावहारिक पैमाने/कार्यक्रम पर चर्चा कर सकते हैं।

पॉलिटिक्स ऑफ़ इंटीग्रेशन के फेसबुक पेज से 

जीवन तो निरंतरता और समकालीनता में चलता है...

कानपुर घोषणापत्र के सन्दर्भ में स्वराज पीठ ट्रस्ट से जुड़े गांधीवादी राजीव वोरा जी ने अपनी जिज्ञासा जाहिर की है|  
 श्रीमान राजीव वोराजी के प्रश्न पर आचार्य रवींद्र का अभिकथन ‘‘जीवन समकालीनता और निरंतरता में चलता है’’, यह हमारा कथन है। यहां हमारे कथन के सामान्य अभिप्राय निम्न हैं- 
हर मनुष्य के जीवन की एक अवधि है, जिसे ‘आयु’ कहा गया है। उस अवधि में एक निरंतरता तो प्रगट ही है। इसमें बदलाव भी है और जुड़ाव भी। दोनों मिल कर निरंतरता कहे जाते हैं। सामान्य रूप से यह खंडित होती नहीं है। मृत्यु से यह खंडित होती है। जीवन का यह सहज रूप प्रायः सभी को मान्य है। जो लोक-परलोक मानते हैं, वे भी इसे वर्तमान जीवन कहते हैं। पहले वाले को पूर्व जन्म और बाद वाले को अगला जन्म। 
समकालीनता के अंतर्गत वे सारी बातें आती हैं, जो हमारे जीवन काल के बीच काल प्रवाह के साथ-साथ रहती हैं या होती हैं, जो भी कहें। 
जन्म से मृत्यु पर्यंत परिवार, समाज, परिवेश भी रहते हैं। जैसे मनुष्य में लगातार परिवर्तन होते रहता है, वैसे उसके समकालीन विभिन्न संदर्भ, जैसे- परिवार, समाज, परिवेश आदि भी बदलते रहते हैं। हम इस सहजता को स्वीकार कर जीने में विश्वास करते हैं।
प्रश्न हो सकता है कि इसे अलग से कहने की क्या जरूरत है? उत्तर है कि आज मनुष्य आपाधापी में एवं अनेक प्रकार की आशाओं में अपने व्यक्तित्व तथा उसके विविध संदर्भ दोनो में चल रहे लगातार परिवर्तन को भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। न काल को, न अवधियों को देखने को तैयार है, न समानांतर हो रही घटनाओं को, जैसे उनसे उसका कोई संबंध ही नहीं। इसी तरह लगातार सुख के संसाधन इकट्ठे करने में उन संसाधनों से सुख भोगने का समय ही नहीं जुटा पाता। संसाधनों की दृष्टि से 2 व्यक्तियों में अंतर हो सकता है। इसी प्रकार उसकी व्यस्तता के स्वरूप में भी अंतर संभव है लेकिन जीवन रूपी अवधि के अन्य छोटे प्राकृतिक काल खंड, जैसे- दिन-रात, महीने, साल, ऋतु आदि के अनुसार शरीर एवं मन भी तो बदलता ही रहता है। वे तो सबके लिए बराबर और साथसाथ परिवर्तनशील हैं। इस सरलता को भी उपभोक्तावादी दृष्टि में झुठलाना सिखाया जाता है, जैसे कोई प्रचारक सिखाता है - ‘‘अभी अनेक जूतों का संग्रह कर लो, सस्ते हैं, बाद में अपनी मर्जी से पहनना’’। कोई सिखाता है- हमें अगले 20-25 सालों के लिए वोट देते रहो, पिछली बार भी दिया था, इस बार भी दो। चिंता क्यों हम कर देंगे।
जो राज्य एवं समाज के आदर्शवादी माडलों के सपने बेंचते हैं, वे कहते हैं। अपने विपक्षियों, प्रतिद्वंद्वियों के सफाए के बाद एक ऐसा आदर्श समाज बनेगा या बनाया जायेगा। तब तक कोई जांच नहीं हो सकती कि उस दिशा में प्रयास या सफलता मिल भी रही है या नहीं। इसमें न समकालीनता है, न निरंतरता है, न कार्यकारण संबंधों की परीक्षायोग्य क्रमबद्धता, चाहे वह माडल रामराज्य का हो या सर्वहारा क्रांति के बाद वाली सरकार का या संपूर्ण पूंजीवादी समाज-राज व्यवस्था का। इससे अलग सोच वाले भी तो हैं ही कि लोकतंत्र या स्वराज की उपलब्धि अचानक आनेवाली घटना नहीं, इसे अपने जीवन की समकालीनता में निरंतर प्रयास एवं सफलता से लाना होगा। इसके लिए उतनी ही अवधि स्वीकृत हो सकती है, जितनी के बिना यह संभव ही न हो। उदाहरण के लिए जैसे ही यह मान्य हो गया कि वयस्क होने की आयु 18 साल है। तो बस, उसके बाद मतदान करने दिया जाय और जब तक दिमाग, देह सचेत हैं, तब तक मतदान करता रहे। इस साल बाढ़ आयी है तो सरकार या मित्र या परिवार के सदस्य यह कैसे कह सकते हैं कि हम मदद अगले साल करेंगे। मुआवजे की राशि मरने के बाद दी जायेगी।
निजी तौर पर समय पर पोषण, शिक्षा, विवाह, प्रजनन एवं अन्य कार्याें की आवश्यकता तथा औचित्य की जांच ‘‘समकालीन निरंतरता’’ की कसौटी पर आसानी से हो सकती है। हमने इसी समझ एवं संदर्भ में मूलतः इन दोनो शब्दों का प्रयोग किया है। 
वैसे अनुभवी विद्वान एवं चिंतक इसका अन्य विस्तार भी बता सकते हैं, जैसे जीवन के लक्ष्य की दृष्टि से, या निर्वाण, मुक्ति आदि की दृष्टि से या फिर कालातीत आदि बनने की साधना की दृष्टि से। 
इसी सन्दर्भ में राकेश मिश्र का कथन है कि समकालीनता और निरंतरता संवाद प्रक्रिया का कालगत निर्णय है| जिम्मेदारी के भाव का अनुशासन है, यूँ कहें कि कर्त्तव्य बोध है| दृष्टा का अनुमान आकलन एवं देश काल परिस्थितियों की समग्रता अलग है| इसलिए कालगत निर्णय भी अलग है| दृष्टा की प्राथमिकता उसके परिवार, परिवेश, प्रवृत्ति, प्रशिक्षण और अनुभवों के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है| उसकी निरंतरता भी एक यथार्थ है जिसको वह जीता है| समकालीनता में यह कालगत निर्णय तमाम सामानांतर धाराओं की सामूहिकता है| व्यक्तिगत स्तर पर कहें तो रिश्ते-नाते, दोस्ती-यारी, पार्टी-क्लब, इत्यादि, इत्यादि| खानाबदोशी में इसकी स्थिति अलग-अलग बनती-बिगडती है| यहाँ देश काल और परिस्थितियों का आकलन अनिवार्य रूप से समकालीनता तो है लेकिन उसके साथ जुड़ाव और जिम्मेदारियां घटती बढती हैं| यह सब ऐच्छिक और अनैच्छिक दोनों रूप से संभव है| चयन भले ही अपनी इच्छा से करें लेकिन समदर्शी दृष्टा लोग सामाजिक होते हुए सबसे रूबरू होते हैं, | आपात स्थिति भी संभव है, उसका भी ख्याल करना होता है| नियम-धर्म, नीति-निर्णय, व्यवहार आदि किसी दृष्टा के कालगत निर्णय ही तो हैं| लेकिन दृष्टा राष्ट्रपुरुष या स्टेट्समैन होता है तो यह दृष्टि समूहों की प्रत्याशा और भावनात्मक एकता की अखंडता के मानक से निर्दिष्ट होती है| संविधान वर्तमान में भारत के नागरिक जीवन का दिशा निर्देशक है, राष्ट्रपुरुष के लिए संविधान के अनुरूप यथोचित व्यवहार अनिवार्य है, क्योंकि वह उसका प्रतीक है| उसकी समकालीनता और निरंतरता में ऐसे हजारों अवयव शामिल हैं जिनकी निरंतरता और जिम्मेदारी उसकी जिम्मेदारी बनती है| यही जिम्मेदारी और कर्त्तव्य बोध की राजनीति विखंडित होती जा रही है| यह गिरावट है| एक दृष्टि से निरंतरता नागरिक जीवन की मध्यम गति का सूत्र हो सकता है, तो समकालीनता समूह के समग्र रूप का दृष्टिबोध|

महानता से डरना क्यों ?

काल के प्रवाह में एक से एक अच्छी बातें अनुपयोगी हो जाती है। अनेक महान व्यक्तियों, परंपराओं एंव संस्थाओं के देश में उनके बीच संगति बैठाने की उलझन भी रहती ही है।
ऐसे में कई बार पुरानी या वर्तमान महानता न ठीक से समझने देती है न संगति बैठाने देती है। मेरी समझ से ऐसी महानताओं से डरने की जरूरत नहीं है बल्कि उसे ठीक से समझने की जरूरत है। एक गजब किश्म की मानसिकता है कि हमारे ग्रंथ, महापुरुष और परंपराएं इतनी महान हैं कि उन पर सवाल उठाना तो दूर वे तो समझी ही नहीं जा सकतीं ? वेद हो या त्रिपिटक, उसे पढा न जाए तब क्या किया जाये। केवल कुछ लोगों के वक्तव्यों को मान लिया जाये। शायद कुरान और बाइबिल के साथ भी ऐसा ही है। चलन में तो यही दिख रहा है कि केवल कुछ लोगों के वक्तव्यों को मान लिया जाये।
यह बीमारी दुर्भाग्य से भारतीय संविधान तक पहुंच गयी। हमारा संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान बना। अब जरा पता करके देख लें कि च्वसपजपबंस ैबपमदबम में च्ीण्क्ण् करने वाले कितने लोगों ने भारतीय संविधान के मूल को देखा भी है, भले ही उन्होंने भारतीय संविधान पर अनेक लोगों की अनेक व्याख्याएं पढ़ी हों।
इस प्रकार महानता का भय भी हमें जुड़ाव की प्रक्रिया से रोकता है। पुनर्विचार की नयी संभावनाओं से रोकता है कि कहीं किसी महान विचार, संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध तो बात नहीं गयी।
भारत में गांधी और मार्क्स नये जमाने के चर्चित नाम हैं। राजनीति वाले लोग इनका नाम खूब लेते हैं। इसके अनुयायी होने के अनेक दावेदार हैं।
एक पक्ष कहता है- बंदूक के बगैर सत्ता नहीं, सत्ता के वगैर परिवर्तन नहीं। परिणाम भी सामने हैं। गांधीवादी सत्य, अहिंसा की बात करते हैं। कांग्रेस से समाजवाद, सर्वोदय तक की यात्रा में कितनी अहिंसा, सत्य आदि बचा है, इससे ये सभी स्वयं सहमत नहीं है। एक जगह अपने को असली कह कर दूसरे का गला काटा जाता है दूसरी जगह परस्पर निंदा और असंवाद तक के झगड़े हैं। मतलब मार्क्स एंव गांधी के कुछ सपने थे, कुछ सिद्धान्त थे। कुछ समाज में आये कुछ सामाजिक धरातल उतर नहीं सके। यदि आंशिक रूप से उतरे भी तो वह पर्याप्त नहीं है।
अब यदि हम समीक्षा ही न करें तो सुधार या नया निर्णय हो कैसे? ऐसी महान परम्परा और उसकी संस्थाएं पुरानी बेडि़यों से कम दर्दनाक थोड़े ही बनती जा रही हैं। केसे समझें कि कौन असली कौन नकली?


"पॉलिटिक्स ऑफ़ इंटीग्रेशन" के फेसबुक पेज से आचार्य रवींद्र कुमार पाठक का अभिकथन 

"भारतीय राजनीति में समग्रता" की जरुरत पर..

कोस्मोलोजी, सृष्टिबोध और राष्ट्रबोध, सामूहिकता को एक साथ लेकर चलने की जरुरत को रेखांकित करते हुए आचार्य रवींद्र कुमार पाठक के चिंतन की समग्रता शब्द का मतलब यहां वैश्विक संदर्भ में भारतीय समग्रता है। समग्रता से यहां स्वर्ग, नरक, अन्य ग्रह एवं संभावित/आशंकित वासी एवं उनकी बातें नहीं हैं।
व्यक्ति, समूह या समाज में व्याप्त/प्रचलित ऐसी बातों की सच्चाई जानने परखने के विवाद में हम नहीं पड़ना चाहते। हमारे लिए ऐसी बातें या तो विश्वास हैं या जाँच/परख के अभी अधीन ही चल रही हैं।
ऐसी बातें परस्पर संबंधों को प्रभावित करने वाली नहीं हों, इतना काफी है। व्यक्ति के मन के भीतर संस्कार, स्मृति आदि के रूप में भी बहुत सारी लोक-परलोक संबंधी बातें हैं। ध्यान के समय लोगों को उनके साक्षात्कार भी होते हैं फिर भी किसी एक व्यक्ति का अनुमान या विश्वास के संभावना बताता है, निर्णय नहीं। जब कोई अनुभव अनेक लोगों को होने लगे तब वह सामाजिक तथ्य बनने लगता है, तब उस पर भी विचार हो सकता है।
ज्ञान की आधुनिक भूख भी कई बार नितांत व्यक्विादी, अति विश्लेषक, नीति एवं प्रकृति के निरपेक्ष होने लग रही है। यह जुड़ाव की प्रक्रिया में बाधा पैदा करती है। स्वयंभू महानता भले ही वास्तविक हो लेकिन उसे समाज पर अपना वर्चस्व लादने का हक नहीं है। वह महानता समाज द्वारा स्वीकृत होगी तभी उसकी सामाजिक स्वीकार्यता हो सकती है। ऐसे महान व्यक्तियों को भी समय से संवाद करने का हक होना चाहिए और यदि उसकी कोई खाशियत समझ में नहीं आ रही हो तो सहसा उसके जीवन एवं संवाद पर आक्रमण उचित नहीं है, चाहे वह किसी भी प्रकार का खोजी या आविष्कारक हो, धर्म, अर्थ, सायंस, टेक्नोलोजी किसी भी मामले में।
लेकिन समग्रता की बात यहीं ख़त्म नहीं होती वैश्विक सन्दर्भों में समग्रता की अन्य चुनौतियाँ भी हैं|  समन्वय से जुड़े आईआईटी दिल्ली के पूर्व छात्र पवन कुमार गुप्ता लिखते हैं कि समग्रता या integration की बुनियाद में integrity और authenticity होती है। ईमानदारी। कोई छोटी-मोटी, लेन-देन वाली ईमानदारी नहीं, अंदर की ईमानदारी। दूसरों को दिखाने वाली से ज़्यादा अपने से ईमानदारी। अपने पूर्वाग्रहों और पूर्वामानों के प्रति भी सजगता की मांग होती है इसमे। न दक्षिन्पंथियों वाली और न ही वामपंथियों वाली बेइमानी इसमे नहीं चल सकती। दोनों ही लेन देन के मामले में ईमानदार माने जाते हैं!
दूसरी बात समग्रता, बगैर सनातन (देश काल से परे) सिद्धांतों के होती नहीं। सनातन और सामयिक में बुनियादी यही है कि सनातन समग्रता लिए हुए ही होता है, कटा हुआ नहीं। और सामयिक काँट-छांट के बिना, बिना कुछ पहलुओं को नज़रअंदाज़ किए चलता नहीं। इसमे कुछ पहलुओं को तवज्जो देनी पड़ती है और अन्यों की उपेक्षा। यह सामयिकता की ज़रूरत है। कार्य और व्यवहार दोनों ही सामयिक होते है। फर्क सिर्फ यह हो सकता है कि निर्णय लेते वक्त हमने सनातन को केंद्र में रखा है या उसकी अनदेखी कर दी है।
राजनीति में यही खोट आ गया है कि उसमे सनातन की उपेक्षा होने लगी है। इसीसे फिर वोट की राजनीति, ध्रूविकरण की राजनीति इत्यादि निकलते हैं। इसी से आज के तथाकथित आध्यात्मिक गुरुजन निकलते हैं। मीडिया, बाज़ार और टेक्नोलोजी का गठजोड़ इसको हवा और वेग देता है। इसीमें अर्थ से हट कर (खोखले) शब्द हावी हो जाते हैं। अगर सनातन का ध्यान नहीं रखा जाएगा, बावजूद सामयिक मुद्दों के जबरदस्त दवाब के, तो हमारी राजनीति को भी सामयिकता निगल लेगी। सामयिकता में मुख्यधारा की भयंकर ताकत होती है।
"पॉलिटिक्स ऑफ़ इंटीग्रेशन" के फेसबुक पेज की परिचर्चा से

पहचान का सवाल : समग्रता और जुड़ाव की राजनीति कैसे हो?

"Politics of Integration" (पॉलिटिक्स ऑफ़ इंटीग्रेशन) के फेसबुक पेज पर हुई चर्चा में श्री वागीश जी ने ध्यान दिलाया है। उस पर आचार्य रवींद्र कुमार पाठक का अभिकथन---
राजनीति से यहां मेरा अभिप्राय उन सारी समझ एवं क्रियाकलापों से है, जो समाज की व्यापक समस्याओं को समझने एवं उनका समाधान ढ़ूँढ़ने के लिए जरूरी हों।
जब समस्याएं ही अनेक हों और आपस में गुंथी हुई सी हों तो मेरे जैसा साधारण आदमी पीड़ा भले महसूस करे, सीधा-सपाट तुरंत फुरंत वाला समाधान कैसे दे या राजनीति की परिभाषा कैसे दे ? परिभाषा तो पूरी तरह बंधी होती है। परितः चारो तरफ से भाषित वर्णित, वह होती है परिभाषा। एक अक्षर न कम, न अधिक। मजबूरी में कुछ लक्षण बता सकता हूँ। लक्षण मतलब पक्की पहचान, परिभाषा नहीं।
राजनीति की पक्की पहचान है सत्ता/सामर्थ्य अंग्रेजी की पॉवर  जैसी, उसका सृजन, उपयोग और उसकी रक्षा। परिवार एवं समुदाय के अधिकार आज राज्य की संप्रभुता के सिद्धांत के समक्ष विलीन, विस्मृत या लुप्त जैसे हो गये हैं।
भारत में धर्म का एक दायरा चूँकि राज्य से बड़ा रहा है। अतः ऐसी सत्ता सामर्थ्य को राजनीति कहा जाने लगा। राजा, राज्य और धर्म के बीच आपसी संघर्ष भी रहा, यही हाल अर्थ सत्ता सामर्थ्य की सृजन, उपयोग और संरक्षण का रहा। भारतीय धर्म की एवं आर्थिक गतिविधियां पहले भी केवल भारत तक सीमित नहीं थीं। अतः राजनीति शब्द के अर्थ को केवल राज्य या राजा की सीमा तक रोका नहीं जा सकता। वैसे भी हर स्थान पर राज्य एवं शासन का कोई न कोई रूप होता ही है, चाहे वह परिवार जैसी छोटी इकाई क्यों न हो, यदि अराजकता न फैली हुई हो।
संक्षेप करें तो मतलब निकला कि हर प्रकार के सत्ता सामार्थ्य का मानवीय सृजन, उपयोग और नियंत्रण।
शब्दों की भारी दिक्कत है। करूं तो क्या करूं अंग्रेजी-हिन्दी में मेल नहीं बैठते। खैर, मेरे कहने का आशय यह है कि जुड़ाव भी कई प्रकार के होते हैं लेकिन अपनी पसंद का जुड़ाव परस्पर पूरकता, विस्तार एवं अनुकूलता वाला है। युद्ध या विध्वंसक जुड़ाव नहीं। वह तो मजबूरी है।
एकता, जुड़ाव जो कहें, इसमें अनुकूलता-प्रतिकूलता के दो प्रमुख कारण हैं- पहला प्राकृतिक परिस्थिति, दूसरा अपनी पहचान और उस पहचान में दूसरे का स्थान। अपनी पहचान में परिवार के सदस्यों से लेकर विश्व के अन्य मनुष्य, जीव-जन्तु, जड़-चेतना, जिस किसी के लिए जो स्थान तथा संभावना निर्धारित होगी हमारा सहज व्यवहार वैसा ही होगा। उसमें अनुकूलता, शांति सुख महसूस होगा। हो सकता है मजबूरी में या षडयंत्र/कपट के समय हमारा व्यवहार भिन्न लगे किन्तु हम लौट-लौट कर अपनी पहचान पर आयेंगे और उसी के अनुरूप जीने तथा सृष्टि का प्रयास करेंगे।
इसलिए सत्ता संघर्ष में पहचान एक बड़ा मुद्दा होता है। यह व्यक्ति को मानसिक रूप से प्रभावित तथा नियंत्रित करता है। इसे विस्तार से समझने की जरूरत होगी कि कैसे पहचान के साथ छेड़छाड़ की जाती है। बिना युद्ध भी अनेक भले-बुरे काम मात्र इसी उपाय से हो जाते हैं। इसलिए नई पहचान बनाने, पुरानी पहचान बचाने, दूसरे की पहचान बदलने या न बदलने देने के प्रयास राजनैतिक चर्चा के स्थायी मुद्दे हैं।
इसके बाद समझने में थोड़ी सुविधा होगी कि हमारी अनेक पहचानें कैसे हमें भीतरी और बाहरी दोनों स्तरों पर उलझाती, विखंडित करती हैं। हमारी इस कमजोरी का दूसरे कैसे लाभ उठाते हैं। व्यक्ति से ले कर समुदाय, जाति, धर्म, सम्प्रदाय वगैरह सभी जगह यह समस्या है।
एकता की राजनीति की दिशा ऐसी पहचानों को चुनना तथा समर्थन करना भी है,जो परस्पर संगति, संरक्षण, स्नेह एवं एक सीमा के बाद स्वतंत्रता भी देती हो। भारत में पहचान से मुक्ति भी जीवन के गंभीर एवं महान लक्ष्यों में एक है। फिर भी भारतीय समाज ने पहले कितना संगत बनाया कि ठीक है,  आप अपनी पहचान से मुक्त होकर जीने की भी कोशिश कर लें लेकिन आप समाज विरोधी या हिंसक नहीं हो सकते। यदि अनुत्पादक भी रहेंगे तो भी समाज आपकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति का जिम्मेवारी ले लेगा और भारत में आपके इस संकल्प के कारण कम से कम आपकी हत्या तो नहीं होगी। आप ईश्वर, वेद, देवता, धर्म, राजा किसी से असहमत हो सकते हैं।

Monday, 10 April 2017

.क्या हम वास्तव में राष्ट्रभक्त हैं ?

बरसाती राष्ट्रभक्ति का दौर शुरू हुए लगभग अब बहुत वर्ष बीत चुके हैं| इस दौर में हमने
कई दोमुहे राष्ट्रभक्त औरउनकी बनावटी राष्ट्रभक्ति देखी| हमने देखा कि मिडिया में जो लोग बैठे है, जिनको आज
के युवावर्ग विद्वान, समझदार और सुलझा हुआ समझती थी, वे भी वास्तव में बिन पेंदे के राष्ट्रभक्त हैं|

उनकी राष्ट्रभक्ति सत्ता और पैसे से संचालित होती है, आत्मा, स्वाभिमान और स्वविवेक से नहीं| हमने देखा कि

कैसे आधुनिक अर्थशास्त्री अर्थ का अनर्थ करते हैं, हमने देखा कि कैसे देश की जनता को मुर्ख बनाया जाता
है| हमने यह भी देखा कि पढ़े-लिखे कहे जाने वाले डिग्रीधारी भी कैसे राष्ट्रभक्ति के नाम पर मूर्ख बनते
और बनाते हैं| हमने यह भी देखा कि कैसे देश को विदेशियों के हाथो गिरवी रखने में देश के नेताओं और

उद्योगपतियों को शर्म नहीं आती और हमने यह भी देखा कि उनके चमचे और चापलूस कैसे अपनी अपनी सेना

बनाकर जनता के बीच घुसकर जनता को गुमराह करती है|


इतना सब देख लिया लेकिन फिर भी हमारी आँखें नहीं खुलीं, इससे अधिक दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है?
इतिहास में हमने कितनी बार विश्वासघात सहा, कितने कष्ट सहे, कितनी गुलामियाँ सही.. सब भूल गये|
बस याद रहा तो केवल इतना कि किस सम्प्रदाय से नफरत करना है और कैसे धर्म-जाति के नाम पर समाज व राष्ट्र

को बाँटे रखना है| हम भूल गये चाणक्य, चन्द्रगुप्त, विनोबा भावे और महात्मा गाँधी के उस योगदान को
जो उन्होंने राष्ट्र को संगठित करने में दिए| हम भूल गये स्वतंत्रता सेनानियों को जिन्होंने धर्म
और जाति से ऊपर उठकर राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया| हम भूल गये उस
योगदान को जो नानक, कबीर, रामदास, बुद्ध आदि ने दिए इस देश को सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखकर समृद्ध

होने के लिए| हमने उनको ही आधार बना लिया आपस में लड़ने का, नफरत करने का|

तो हमने इतिहास से सार्थक कुछ भी नहीं सीखा और उसका परिणाम यह हुआ कि आज धूर्त और मक्कार लोग
हमारे शुभचिंतक बनकर हमें ही नहीं, हमारी पूंजी भी विदेशियों के हाथो सौंप रहे हैं| हमारे खून पसीने की कमाई
को हमसे ही छीन कर ऐसी जगह रखवा रहे हैं, जहाँ से वे हमे जब चाहें कंगाल बना सकते हैं| उदाहरण के
लिए पेटीएम् या इलेक्ट्रोनिक बैंकिग जिसका संचालन विदेशी कर रहे हैं| अभी हाल ही में खबर पढ़ी कि किसी
शाहदरा के एक व्यक्ति का पूरा पैसा ज़ीरो हो गया पेटीएम् में जब उसने वनटाइम पासवर्ड डाला| अब पुलिस में

शिकायत दर्ज हुई, पुलिस जांच करेगी, फिर कोर्ट में केस जाएगा... उसकी जिन्दगी तो बर्बाद हो जाएगी इस कोर्ट

कचहरी के चक्कर में| सत्रह हज़ार का चुना लगा उसे, लेकिन उसे निकलवाने के लिए पुलिस, वकील और कोर्ट न
जाने कितने का चुना उसे और लगा देंगे|

हम इस पहली धोखाधड़ी की घटना से ही सबक ले लें तो बहुत है, लेकिन मैं जानता हूँ कि जब हमने हजारों
वर्षों में कई बार गुलाम होने के बाद भी सबक नहीं लिया तो अब क्या ख़ाक सबक लेंगे!

फिर आप स्वयं ही सोचिये कि जो सरकार स्वतंत्रता के इतने वर्षो बाद भी कोई भी सार्वजनिक क्षेत्र को नहीं
संभाल पायी, यहाँ तक की बीएसएनएल जैसे सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा ही नहीं संभाल पा रही| जबकि नई नई दूर

संचार की निजी कम्पनियां सफल हो रही हैं, अच्छी से अच्छी सुविधा दे पा रहीं हैं... लेकिन सरकारें
बीएसएनएल से जनता को विश्वसनीय सुविधा नहीं दिला पा रही| हमारी सरकारों से रेलवे तक नहीं
सम्भलता, निरंतर घाटे में जाता रहता है| इनसे अन्न भण्डार नहीं संभालता, लाखों टन अनाज सड़ जाता है...

फिर इनके पास आज तक कोई सरकारी तकनीक ऐसी नहीं है, जिसपर जनता विश्वास कर सके... तो आप
कैसे विश्वास कर सकते हैं कि ये आपका धन जिस इलेक्ट्रोनिक मिडिया के माध्यम से खर्च करवाना चाह रहे
हैं, वह सुरक्षित व विश्वसनीय है ? सरकार का क्या है, आज है कल बदल जाएगी|

तो देशभक्ति का सही अर्थ होता है वह भक्ति जिससे देश व उसके नागरिकों का हित होता हो, न कि किसी
विदेशी कम्पनी का| आपको तो यह भी नहीं पता होता कि कौन सी कम्पनी देशी है और कौन सी विदेशी|
जिओ की जय करने वाले नहीं जानते कि अम्बानी बस इनका चेहरा है असल खिलाडी तो कोई और ही है|
पेटीएम् भी चीनकी ही कम्पनी है| यानि हमारी ही सरकार हमारा ही धन चीन और बकिओं के हवाले करना चाहती है
इलेक्ट्रोनिक माध्यम से| क्या हम इसे देशभक्ति कहेंगे?

फिर राष्ट्रभक्ति तभी सार्थक मानी जायेगी जब देश की सेना और पुलिस प्रजा के प्रति निष्ठावान हो, उत्तरदायी हो|
लेकिन केवल भूमाफियों के इशारों पर ये लोग ग्रामीणों पर लाठियाँ बरसा देते हैं, गोलियाँ चला देते

हैं.. बिलकुल इस प्रकार जैसे वे लोग इंसान नहीं, कोई कीड़े-मकोड़े हैं| तो क्या हम इनको राष्ट्रभक्त कह सकते हैं?


बिलकुल नहीं...!

जो भी व्यक्ति राष्ट्र व उसके नागरिको के प्रति निष्ठावान नहीं है, वह राष्ट्रद्रोही ही कहा जायेगा न कि राष्ट्रभक्त|
फिर वह देश का कितना ही बड़ा धन्नासेठ हो, कितना ही सम्मानित नेता हो, कितना ही बड़ा

सेना या पुलिस का अधिकारी हो, या स्वयं प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ही क्यों न हो| इनमे से कोई भी
राष्ट्र व राष्ट्र के नागरिकों के हित व सुरक्षा से ऊपर नहीं है| यदि राष्ट्र का धन, राष्ट्र का कृषि, भू व खनिज सम्पदा
सुरक्षित नहीं है, यदि राष्ट्र के नागरिक सुरक्षित नहीं हैं तो उत्तरदायी राष्ट्राध्यक्ष व उसके अधीनस्थ सभी राजकीय
विभाग, मंत्री व अधिकारीगण होते हैं| और यह एक बहुत ही बड़ी जिम्मेदारी होती है|


इसलिए प्रजा यदि अब भी होश में नहीं आएगी, अब भी करण-अर्जुन आएंगे वाला डायलॉग बोलेगी तो फिर से
हमें विदेशियों का गुलाम होने से करण-अर्जुन भी नहीं बचा पाएंगे| यदि हम आज भी नेताओं के बिछाये
जात-पात व धर्म की राजनीती से स्वयं को बाहर करके विशुद्ध भारतीय नहीं बनेंगे, तो हमें न अल्लाह

बचा पायेगा और न ही जय श्री राम|


होश में आइये... मैं जानता हूँ कि आप लोगों की शिक्षा भारतीय पद्धति से नहीं हुई है, इसलिए भारत आपकी माता
नहीं है, आपके मन में भारत के प्रति वह सम्मान नहीं है जो अपनी माँ के प्रति होता है| मैं यह भी जानता

हूँ कि आप में से कई नास्तिक हैं तो कई विदेशी संस्कृति व धर्म से प्रभावित, इसलिए भी भारत के
प्रति संतानोचित अपनत्व नहीं है, विदेशों में सेटल होने का सपना देखते रहते हैं.... लेकिन फिर भी| मेरा सभी से
आग्रह है कि जब तक भारत की भूमि पर हैं, कम से कम तब भारत के प्रति निष्ठावान रहें| जब आपकी नौकरी

लग जाये विदेश में, तब आइयेगा शत्रु बनकर, हम उतने ही प्रेम से आगे बढ़कर आपका स्वागत करेंगे और शत्रुता
निभाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ेगे|

Sunday, 9 April 2017

राजनीति में समग्रता की बात और षडयत्र की जरुरत

बात है समग्रता की राजनीति की... भय, षड़यंत्र और संवाद की| कथ्य है कि समग्रता की राजनीति में इन तीनों स्तरों पे एक साथ काम करना होगाइस चिंतन की बुनियाद सिर्फ इतने पर है कि क्या आम आदमी के दिमाग की उलझनें, उसकी जीवन चुनौतियाँ और बुनियादी जरूरतें असली मामला है या कुछ और...|  वैश्विक सन्दर्भों में राष्ट्र, राज्य की अवधारणा में इन जरूरतों और चुनौतियों के सूत्र क्या हैं? आम आदमी के दिलो-दिमाग  के विचार भावनाओं का मूल्य कितनी अहमियत रखता है? मानवीय भावनाओं का  कितना ख्याल रखा जा रहा है|  नगर ग्राम की व्यवस्था में,  प्रकृति परिवेश की व्यवस्था में, हमारे पास राजकाज के सूत्र हैं...  संवाद भयऔर षड़यंत्र| इसी से बुनियादी अवधारणाओं का व्यावहारिक निर्माण संभव होता है| इन्ही तीन सूत्रों से व्यक्ति, समाज और संस्थान की बुनियाद बनती है|  एक संस्थान परिवार भी है चूंकि परिवार एक शिशु को पैदा ही नहीं करतावह रक्षा न करे तो शिशु मर जाए अतः पूर्ण वयस्क होने तक परिवार का निर्णय मानना जरूरी है। 
अपने को स्वयं स्वामीविजेतानिर्णायकविशिष्ट मानने वाली पहचान और उस आधार पर दूसरे पर अपनी बात या इच्छा थोपना किसी को भी मान्य नहीं होता| इसीलिए परिवार की व्यवस्था में नियम है  सर्वत्र जयमिच्छंतुपुत्रात-शिष्यात पराजय। 'हर जगह जीत की ख्वाहिश रखो, पर बेटे और शागिर्द से हार की। अब झगडा ख़त्म| बेटे की परवरिश तक की जिम्मेदारी उठाने के बाद उसकी सफलता पर कौन खुश नहीं होता| यही साधारण नियम है| इस नियम का मूलभूत पक्ष भावनात्मक है| भावनात्मक रूप से किसी से जुड़कर ही हम उसकी ख़ुशी और प्रगति में अपना आनंद पा सकते हैं| ये तो रही दिल के रिश्ते की बात| लेकिन   राजनीति में यही नियम विरोधाभास मालूम होता है| यहीं गड़बड़ है, यही विखंडन को जन्म देता है व्यक्ति, समाज और संस्थान की कानूनी और सामाजिक अडचनों का मूलभूत पक्ष यही है| कोई भी पार्टी हो, कंपनी हो या कानूनी तौर पर स्थापित एनजीओ| संस्थान में आदमी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए काम करता है| साथ ही वह अपनी मेधा और रूचि के अनुरूप अधिकारों और कर्तव्यों का भी अनुकरण और अनुसरण करता है| अब बताइए तो कि कोई शागिर्द अगर ज्ञान, साधन, और संगठन की परिपाटी अथवा स्थापित नियमों में खुद को प्रवीण पाता है और उसे प्रगति का मार्ग अवरुद्ध लगता है तो वह अलग क्यों न होगा? उसका बुनियादी अधिकार और कर्तव्य तो अपने और दूसरों के लिए बेहतर करने के अवसरों और संभावनाओं में सर्वश्रेष्ठ करने के लिए हैं| ऐसे में अमुक व्यक्ति कानूनी बंधन में या स्थापित परिपाटी में स्वयं को बंधा हुआ क्यों न मानेगा? समाज हो या संस्थान अगर व्यक्ति के साथ अन्याय हो यही  परिस्थिति भयमूलक भी हो सकती है| यही षड्यंत्र की भी प्रेरणा हो सकती है| इसीलिए योग्यता और रूचि के नियम हैं, शिक्षण-प्रशिक्षण के भी| संस्थानों में प्रगति और विकास के भी नियम हैं, प्रमोशन और कार्य संतुष्टि के लिए जो भी संगठन संजीदा होते हैं उनका विकास तय है| क्योंकि व्यवस्था तो वही है जिसमे बारिश हो तो सबको बराबर मिले| इन्सान हो या जानवर, पशु-पक्षी हो या पेड़-पौधे पानी तो सब पर बराबर बरसता है| cosmology की बात तो सिर्फ इतनी है कि भावना और और आपसी भरोसा बना रहे| यही नियम घर की बुनियादी बात है| इसी से भावनात्मक लगाव और भाईचारा भी बढ़ता है| तो बताइए समग्रता का नियम अनिवार्य है या नहीं....?

Saturday, 8 April 2017

Vagish ji ki aarambhik baat

Vagish K Jha मैं आपकी बात के मूल भाव से सहमत हूँ, पाठक जी। एक समग्र जीवन दृष्टि की तलाश हर समय की नई और ज़रूरी तलाश होती है। और इसकी रूपरेखा अध्यवसाय, सामाजिक कर्म और व्यापक संवाद से ही बनती है। मेरे लिए यही राजनीति है, एक उस समग्र दृष्टि की सामूहिक तलाश जो व्यापक कल्याण का रास्ता न्याय और नैतिक आधार पर खड़ा हो। ये तमाम शब्द आज खतरे में हैं और हर काल में इनको नए अर्थ देने की ज़रूरत होती है। इस खोज के क्रम में संस्कृति का समीचीन अर्थ भी उभरता है। यहां मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि संस्कृति मेरे लिये कोई वैचारिक जीवाश्म या fossil नही बल्कि एक जीवंत आग्रह है जो अतीत से प्रेरणा तो लेता है लेकिन भविष्य की ओर मुखातिब होता है। ऐसे में संस्कृति का काम शब्दों को आज के संदर्भ में नए अर्थ देना भी होता है। गांधी ने सत्य और अहिंसा का जो अर्थ प्रतिपादित किया वो उस समय के लिए एक नया अर्थ था। संवाद की ईमानदार प्रक्रिया ही इस अर्थ को प्रतिपादित करने एक प्रभावी तरीका है। यहां संवाद केवल विद्वानों की मंडली के साथ होने वाली बातचीत से आगे, अपने समय और समाज के साथ का संवाद है। इस तरह मैं ज्ञान और व्यवहार के द्वैध को भी नही मानता। इन दोनों के बीच भी एक सतत संवाद चलता है जिसको सुनने का विवेक और इसमें शामिल होने की विनम्रता पैदा कर पाना एक बड़ी चुनौती है। ऐसा भी नही कि आप या हम इसकी एक नई शुरुआत करने का प्रस्ताव लेकर आये हैं। यह तो शुद्ध अहंकार होगा। संवाद चल रहा है, लगातार। इस यज्ञ में हम भी एक होता की भांति शामिल हों, पुरोहित बनने का दम्भ त्याग कर तो फिर यह समाज कल्याण का यज्ञ हो सकेगा। हम सब जो अपने स्तर पर ऐसे कामों में लगे हैं, वे साथ आकर एक दूसरे की सुने तो यह बात बनाने की सही शुरुआत होगी, ऐसा मेरा मानना है। संवाद की शुरुआत तो सुनने से होती है। मैं सुनने को आतुर हूँ। जब कहें, जहां कहें...


इसे थोड़ा और स्पष्ट तथा विस्तृत रूप देने की कृपा करें। 
Ravindra

वागीश झा जी का स्वागत है।

वागीश जी कई विधाओं में दखल रखते हैं साथ ही समाज के प्रति संवेदनशील भी हैं। बतौर ब्लाग लेखक इनके शामिल होने से हमारी चर्चा को बल मिलेगा।

Friday, 7 April 2017

Geo-Politics - What Why and How to go about

The standard text book definition of geo-politics is " concerned nations fight for resources in international arena".  Here the definition does not say what is meant by resources. Resources are both human and natural. so the process of study of control of international resources both human and natural for a nation state survival is called the theory and practice of geo-politics. 

This is nothing but the definition of colonialism or mercantile based colonialism. The question of human resources brings the religion in to play as homogeneity of religion or culture or language is essential to control the populations. So the historical evolution of religion its manifestations and the propagation and how that religion as opium and cocaine became the basis of every thing we see and experience which masquerades as economic theories and ideologies. The same religion culture and language that becomes the basis of geo-political players country's unity becomes tool of division in the target country that is filled with human and natural resources.

The second aspect of natural resources from the time of colonial empires till the current liberalization in the name of private development is nothing but loot of resources either by out right occupation or by a process of academic theoretical benign developmental ideologies coupled with the manipulation of selective religious cultural prides and creation of neo zamindari systems of industrial tycoons to perpetuate the same colonial rule. 

When we study geo-politics we have to understand the historical basis of this religious fight that started at least 2000 years ago with the advent of multiple colors of christianity and progressed through the evolution of many shades of islam which in 19th century when no longer were able to function on the basis of religion metamorphosed as economic ideologies of either capitalim or communism and when that no longer worked took the new avatar of Liberalization and privatization and monopolar and multi polar worlds. 

But all these they did for last 400 years earnestly to control international resources specifically Indian and Chinese resources be it human or natural. It is the indian human resource or her ability to supply human resources endlessly that was the cause of the winning of the first and second world wars. 

Unfortunately as part of control of human resources the British did an excellent job of keeping all brilliant minds in India from even acknowledging this subject of geo-politics leave alone becoming experts. British feared correctly that once Indians start study this India becomes a super power. 

What and how to do ?

First the institute should have a through research base to collect preserve all documents texts world wide since last 400 years that were written about generous Indian resource sharing. And the entire evolution of international treatise and wars that were fought for the above generous sharing of indian resources. This provides a historical back drop and practical case studies of what went for lastt 400 years. This involves set up of country wise region wise divisions that will toil to collect this information and preserve and bring to the Indian audience.

Next, a timely practical course structure (either private or in collaboration with NGOS or administrative training institutes) has to be prepared and should be made part of curriculum of at lease Administrative services or politicians (if their infinite all pervading wisdom allows them to heed) so that at least they in the next 10 years will be able to see the practcal utility of GP in the functioning of the nation and making policy forward.

There are many think tanks in India for study of go-politics. But most of them are accommodation centers for semi retired young individual to become residents of the particular city where these are set up. We want to create some thing different that can change the course and direction of the nation in next 10 years from (IN)dependence that we have to Purna Swaraj that was the goal of Bose and others. 

With permission from Srinivas Prasad KIdambi, GPSSI