हमारी कार्यशैली
1. हम राजनीति में बदलाव के लिए प्रयासरत हैं। हमारा मार्ग संवाद, प्रेम और सहमति का है।
2. कुछ अति स्वार्थी, सदैव दूसरों को अपने अधीन रखने या धोखा दे कर शोषण करने वाले लोग या दुष्ट प्रकृति के लोग हमारे विपक्षी हैं। जरूरी नहीं है कि वे हमसे सहमत हो जाएं। फिर भी यदि पर्याप्त रूप में नैतिक, बौद्धिक और भावनात्मक बल के साथ समाज के पर्याप्त लोगों का दबाव पड़ेगा तो उन्हें भी लोकतंत्र में बड़ी और मजबूत आवाज के सामने झुकना होगा। यह हमारी भविष्य से आशा-अपेक्षा है।
3. ऐसे विपक्षियों को छोड़ देने पर भी समाज में ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जो भ्रमवश गुमराह हैं या अज्ञान में हैं। बहुतों के पास तो सूचना का अभाव है। हम उनसे पहले बात करना चाहते हैं, जो राजनीति को चाहे जिस तरह से समझते महसूस करते हों लेकिन कहीं न कहीं उसके अधूरेपन या वि सदाबहार जवाब नहीं है लेकिन पूरी क्षमता से हमने समझने की कोशिश की है और आगे भी दीर्घकालिक तथा अल्पकालिक मुद्दों पर बात करते रहेंगे।
4. जैसा कि हम संवाद एवं सहमति में विश्वास करते हैं अतः हमारी कार्य शैली भी संवाद वाली है। सहमति के पहले संवाद जरूरी है। वह भी बौद्धिक तथा भावनात्मक दोनों स्तरों पर। इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते जाना है। आरंभिक संवाद से ले कर समाज की समझ तथा राजनीति में हस्तक्षेप तक हमार प्रयास संवाद, सहमति आदि समाज स्वीकृत तरीकों से होगा।
5. हमें इस बात पर जरा भी भरोसा नहीं हैं कि पहले किसी भी जायज-नाजायज तरीके से सत्ता पर काबिज हुआ जाये, उसके बाद सत्ता के बल पर हम जबरन बदलाव कर देंगे। हम इतने भी अतिवादी आशावादी नहीं हैं कि हमारा किसी से विरोध नहीं है या न हो लेकिन हम अपने विरोधी को इस तरह समाज के बल पर हराना चाहते हैं कि वह स्वयं भी बहुत हद तक हमसे सहमत हो। यह तरीका धोखेबाजी वाला है।
6 ये तो कुछ मूल सूत्र भर हैं। समग्रता वाली दृष्टि के साथ हर समय नयी-नयी बातें जुड़ सकती हैं जो परस्पर जोड़ने वाली हों। अपने लक्ष्य के अनुरूप हर तरीका मान्य होगा बशर्ते कि वह लक्ष्य एवं नीतियों का विरोधी न हो।
1. हम राजनीति में बदलाव के लिए प्रयासरत हैं। हमारा मार्ग संवाद, प्रेम और सहमति का है।
2. कुछ अति स्वार्थी, सदैव दूसरों को अपने अधीन रखने या धोखा दे कर शोषण करने वाले लोग या दुष्ट प्रकृति के लोग हमारे विपक्षी हैं। जरूरी नहीं है कि वे हमसे सहमत हो जाएं। फिर भी यदि पर्याप्त रूप में नैतिक, बौद्धिक और भावनात्मक बल के साथ समाज के पर्याप्त लोगों का दबाव पड़ेगा तो उन्हें भी लोकतंत्र में बड़ी और मजबूत आवाज के सामने झुकना होगा। यह हमारी भविष्य से आशा-अपेक्षा है।
3. ऐसे विपक्षियों को छोड़ देने पर भी समाज में ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जो भ्रमवश गुमराह हैं या अज्ञान में हैं। बहुतों के पास तो सूचना का अभाव है। हम उनसे पहले बात करना चाहते हैं, जो राजनीति को चाहे जिस तरह से समझते महसूस करते हों लेकिन कहीं न कहीं उसके अधूरेपन या वि सदाबहार जवाब नहीं है लेकिन पूरी क्षमता से हमने समझने की कोशिश की है और आगे भी दीर्घकालिक तथा अल्पकालिक मुद्दों पर बात करते रहेंगे।
4. जैसा कि हम संवाद एवं सहमति में विश्वास करते हैं अतः हमारी कार्य शैली भी संवाद वाली है। सहमति के पहले संवाद जरूरी है। वह भी बौद्धिक तथा भावनात्मक दोनों स्तरों पर। इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते जाना है। आरंभिक संवाद से ले कर समाज की समझ तथा राजनीति में हस्तक्षेप तक हमार प्रयास संवाद, सहमति आदि समाज स्वीकृत तरीकों से होगा।
5. हमें इस बात पर जरा भी भरोसा नहीं हैं कि पहले किसी भी जायज-नाजायज तरीके से सत्ता पर काबिज हुआ जाये, उसके बाद सत्ता के बल पर हम जबरन बदलाव कर देंगे। हम इतने भी अतिवादी आशावादी नहीं हैं कि हमारा किसी से विरोध नहीं है या न हो लेकिन हम अपने विरोधी को इस तरह समाज के बल पर हराना चाहते हैं कि वह स्वयं भी बहुत हद तक हमसे सहमत हो। यह तरीका धोखेबाजी वाला है।
6 ये तो कुछ मूल सूत्र भर हैं। समग्रता वाली दृष्टि के साथ हर समय नयी-नयी बातें जुड़ सकती हैं जो परस्पर जोड़ने वाली हों। अपने लक्ष्य के अनुरूप हर तरीका मान्य होगा बशर्ते कि वह लक्ष्य एवं नीतियों का विरोधी न हो।
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