Friday, 2 June 2017

गहरे पानी पैठ 2


गहरे पानी पैठ 2
समानता किनसे? स्वतंत्रता किससे? मेरी स्वतंत्रता, तेरी स्वतंत्रता कहां? किस मामले में? संदर्भ तो सामने रखना ही होगा तब स्वतंत्रता समझ में आ सकेगी।
भारत के लोगों ने न केवल राजनैतिक अपितु पूरी, अधिकतम स्वतंत्रता की खोज शुरू की? परिभाषाएं गढ़ीं और ध्यान से लेकर अनेक प्रकार की जीवन शैलियों का प्रयोग किया। मामला उलझा यह कि इस तन-मन का क्या करें? इसकी बनावट की जो सीमा है, वह भी तो बंधन है? मेरे सुधरने से संसार सुधरेगा इस पर कैसे विश्वास किया जाए क्योंकि अनेक परम प्रतापी और सुधरे लोग भी कहां सब को कहां सुधार पाए?
ंअंत में कुछ लोग इस हद तक चले गये कि जन्ममृत्यु के चक्कर में ही बंधन और दुख है। आगे से न पैदा होंगे न दुख होगा। ‘विभज्यवादी’ (विश्लेषणवादी) गौतम बुद्ध जी का यह मत बहुत हावी रहा ।
इसके विपरीत सात्म्यवादी और समानाधिकरण्यवादी हैं। रहे गर्मी या ठंढक, पेट भरा रहने और शरीर पर पर्याप्त कपड़ा रहने पर क्यों डरें गर्मी या ठंढ से? घर हो तो और अच्छा, हम तो हर हाल में खुश रहेंगे।
42 डिग्री तापमान 46-47 वालों को क्या दुख देगा?
मूल भाव यह है कि बंधन सापेक्ष स्वतंत्रता होती है, एह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष है संभावना और अवसर सापेक्ष स्वतंत्रता तथा समानता की। वह प्रकृति, उससे छोटे समाज तथा उनसे छोटी व्यवस्था की अन्य इकाइयों के सापेक्ष है। पहले जब सार्वजनिक जंगल, सार्वजनिक चारागाह, सार्वजनिक जमीन, सार्वजनिक जलाशय एवं अनेक मुक्त क्षेत्र थे, तब की बात अलग। आज ऐसे सार्वजनिक स्थान और सार्वजनिक अवसर राज्य के अधीन हो गये हैं। कैसे उससे आम आदमी का अपनापन हो? अतः संदर्भों को तो ध्यान में रखना ही होगा।

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