वैसे तो हमने अपने घोषणा पत्र में लिखा है कि हम क्या क्या करना चाहते हैं। उसके साथ यह भी कि अनेक नयी बातों को सीखने-जोड़ने के लिए भी तैयार हैं।
विखंडन, घृणा, असहिष्णुता, आक्रोश, बदला, जीत, वर्चस्व हमारा लक्ष्य नहीं है। न हम ऐसे अतिवादी या ढोंगी हैं कि कहें कि हम आक्रमण पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं करेंगे। एक सीमा तक सहना और तालमेल बनाना मैत्री आदि गुणों के विकास के लिए जरूरी है लेकिन सर्वस्व समर्पण तो आधुनिक युग के अहिंसा पर प्रयोग करने वाले महात्मा गांधी ने भी नहीं स्वीकार किया अन्यथा आजादी की मांग ही अप्रासंगिक हो जाती।
इसलिए हमारे सामने एकता की राजनीति में आत्मीयता, मैत्री आदि भावनाओं के विकास हेतु रचनात्मक कार्यक्रमों की समझ तथा नये प्रासंगिक कार्यक्रम गढ़ने और जीने की भी चुनौती है। इसके बगैर हमारा प्रयास अविश्वसनीय बौद्धिक कबायद भर हो कर रह जायेगा। भरसक ऐसा तो हम होने न देंगे।
सीधे कार्यक्रमों के प्रस्ताव के पहले हम जरा एक बार पता करने की कोशिश तो कर लें कि इसमें अभी क्या संभावनाएं हैं।
समाज में स्नेह, प्रेम, पारस्परिकता, अपनापन आदि गुण जितना बचा है, उसका समर्थन करना सबसे पहले जरूरी है, बशर्ते कि वह अपनी कीमत पर हो। दूसरे की संपत्ति के दान करने वाले बहुत होते हैं। आढ़त में धर्मादा जोड़ कर गोरक्षिणी चलाने या अरब के पैसे पर हिन्दुस्तान में यतीमखाना चलाना और स्थानीय सहभागिता को नकारना, धर्मांतरण की शर्त और योजना के साथ अस्पताल स्कूल चलाना या ऐसे अन्य कार्य बड़े ही उलझाने वाले होते हैं। इन्हें ठीक से समझना भी होगा। नागरिकों की खुशी से अलग राष्ट्र, सर्वहारा की तानाशाही जैसे अनेक जुमले आज की चलन में हैं। इनमें से झूठ सच को अलग कर सच के पक्ष में खड़ा होना होगा। गोरक्षिणी नहीं गोवंश नस्ल सुधार वह भी नागरिकों की पहल से या राज्य के द्वारा, अपने धन से दान, देशी चंदे से यतीमखाना और बिना भूतप्रेत का भ्रम फैलाये, बिना धर्मांतरण की शर्त के मिशनिरी क्रिया कलाप, बिना दबाव घर वापसी आदि सभी अच्छे हैं। देश के कमजोर और गरीब को प्राथमिकता देने वाले विकास के सरकारी कार्यक्रम ऐसे अनेक उदाहरण हो सकते हैं। मामला गड़बड़ तब है जब कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना हो। हमें ऐसा नहीं करना।
हमने तो अभी शुरुआत की हैं, हम न पार्टी हैं, न राज्य, न सरकार। अतः तत्काल तो बस हम आपकी म्रगल कामना कर सकते हैं। जैसे ही हमारा संगठनात्मक रूप बनने लगेगा। हम एक से एक दिल लूटने वाले कार्यक्रम ले कर आपके पास हाजिर होंगे। तब तक दिमागी कसरत कर लेते हैं।
आज न 1942 की स्थिति है न 1947-48 की। इस बीच बहुत कुछ बदल गया। अतः आज की तारीख में प्रेम, करुणा, दोश्ती के नये तरीके इजाद करने ही होंगे। यह सब आज के संदर्भ में करना होगा। छूआछूत पहले जैसा नहीं हैं, न ही दलितों की वह हालात है। सवर्णों की दशा भी बदली है। चुनावी उठापटक के नये नये पैंतरे चलन में आ गये हैं। अंतर्जातीय विवाह की चलन बढ़ रही है। शहरीकरण तेजी में है। ये सारी बातें क्या प्रगट नहीं हैं।
विकट समस्या समझ के साथ चालाकी के अधिक बढ़ जाने और विखंडित व्यक्तित्व की अधिक है। विचार की राजनीति तेजी से समाप्त हो रही है। आर्थिक नीतियों के मामले में 2 बड़े राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा एक हैं और अन्य अनेक दल भी कमोबेश उन्हीं नीतियों के समर्थक हैं। पुराने सामंतवाद की जगह नवसामंतवाद स्थापित हो रहा है। नव धनाढ्यों की राजशाही की नकल बहुत कुछ कह रही है।
बस सबसे पहले मिलावट से बच कर सीधी बात कहने की हिम्मत जुटानी और आपसी अपनापन के प्रस्ताव की सच्चाई पर खरा उतरना। यही सरल राजनीति है। इसके लिए कुछ मोटे नियम बन सकते हैं। भाव असली होता है, नियम तो सहायता करते हैं। निजी जीवन एवं अपने चिंतन में दूरी गलती से भले रह जाए, अपेक्षित नहीं है। हां एक बात साफ कि लक्ष्य और वर्तमान के बीच क्रमबद्ध संगति होती है, सीधी नहीं। अतः यह किसी से आशा नहीं की जा सकती कि किसी भावी योजना या लक्ष्य से सहमत व्यक्ति तुरत उसी प्रकार से जीना शुरू कर दे। फिर भी क्रमबद्धता तो माननी होगी ही वरना ऐसी समझ पाखंड हो जायेगी।
आगे हम ऐसे कुछ व्यावहारिक पैमाने/कार्यक्रम पर चर्चा कर सकते हैं।
विखंडन, घृणा, असहिष्णुता, आक्रोश, बदला, जीत, वर्चस्व हमारा लक्ष्य नहीं है। न हम ऐसे अतिवादी या ढोंगी हैं कि कहें कि हम आक्रमण पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं करेंगे। एक सीमा तक सहना और तालमेल बनाना मैत्री आदि गुणों के विकास के लिए जरूरी है लेकिन सर्वस्व समर्पण तो आधुनिक युग के अहिंसा पर प्रयोग करने वाले महात्मा गांधी ने भी नहीं स्वीकार किया अन्यथा आजादी की मांग ही अप्रासंगिक हो जाती।
इसलिए हमारे सामने एकता की राजनीति में आत्मीयता, मैत्री आदि भावनाओं के विकास हेतु रचनात्मक कार्यक्रमों की समझ तथा नये प्रासंगिक कार्यक्रम गढ़ने और जीने की भी चुनौती है। इसके बगैर हमारा प्रयास अविश्वसनीय बौद्धिक कबायद भर हो कर रह जायेगा। भरसक ऐसा तो हम होने न देंगे।
सीधे कार्यक्रमों के प्रस्ताव के पहले हम जरा एक बार पता करने की कोशिश तो कर लें कि इसमें अभी क्या संभावनाएं हैं।
समाज में स्नेह, प्रेम, पारस्परिकता, अपनापन आदि गुण जितना बचा है, उसका समर्थन करना सबसे पहले जरूरी है, बशर्ते कि वह अपनी कीमत पर हो। दूसरे की संपत्ति के दान करने वाले बहुत होते हैं। आढ़त में धर्मादा जोड़ कर गोरक्षिणी चलाने या अरब के पैसे पर हिन्दुस्तान में यतीमखाना चलाना और स्थानीय सहभागिता को नकारना, धर्मांतरण की शर्त और योजना के साथ अस्पताल स्कूल चलाना या ऐसे अन्य कार्य बड़े ही उलझाने वाले होते हैं। इन्हें ठीक से समझना भी होगा। नागरिकों की खुशी से अलग राष्ट्र, सर्वहारा की तानाशाही जैसे अनेक जुमले आज की चलन में हैं। इनमें से झूठ सच को अलग कर सच के पक्ष में खड़ा होना होगा। गोरक्षिणी नहीं गोवंश नस्ल सुधार वह भी नागरिकों की पहल से या राज्य के द्वारा, अपने धन से दान, देशी चंदे से यतीमखाना और बिना भूतप्रेत का भ्रम फैलाये, बिना धर्मांतरण की शर्त के मिशनिरी क्रिया कलाप, बिना दबाव घर वापसी आदि सभी अच्छे हैं। देश के कमजोर और गरीब को प्राथमिकता देने वाले विकास के सरकारी कार्यक्रम ऐसे अनेक उदाहरण हो सकते हैं। मामला गड़बड़ तब है जब कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना हो। हमें ऐसा नहीं करना।
हमने तो अभी शुरुआत की हैं, हम न पार्टी हैं, न राज्य, न सरकार। अतः तत्काल तो बस हम आपकी म्रगल कामना कर सकते हैं। जैसे ही हमारा संगठनात्मक रूप बनने लगेगा। हम एक से एक दिल लूटने वाले कार्यक्रम ले कर आपके पास हाजिर होंगे। तब तक दिमागी कसरत कर लेते हैं।
आज न 1942 की स्थिति है न 1947-48 की। इस बीच बहुत कुछ बदल गया। अतः आज की तारीख में प्रेम, करुणा, दोश्ती के नये तरीके इजाद करने ही होंगे। यह सब आज के संदर्भ में करना होगा। छूआछूत पहले जैसा नहीं हैं, न ही दलितों की वह हालात है। सवर्णों की दशा भी बदली है। चुनावी उठापटक के नये नये पैंतरे चलन में आ गये हैं। अंतर्जातीय विवाह की चलन बढ़ रही है। शहरीकरण तेजी में है। ये सारी बातें क्या प्रगट नहीं हैं।
विकट समस्या समझ के साथ चालाकी के अधिक बढ़ जाने और विखंडित व्यक्तित्व की अधिक है। विचार की राजनीति तेजी से समाप्त हो रही है। आर्थिक नीतियों के मामले में 2 बड़े राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा एक हैं और अन्य अनेक दल भी कमोबेश उन्हीं नीतियों के समर्थक हैं। पुराने सामंतवाद की जगह नवसामंतवाद स्थापित हो रहा है। नव धनाढ्यों की राजशाही की नकल बहुत कुछ कह रही है।
बस सबसे पहले मिलावट से बच कर सीधी बात कहने की हिम्मत जुटानी और आपसी अपनापन के प्रस्ताव की सच्चाई पर खरा उतरना। यही सरल राजनीति है। इसके लिए कुछ मोटे नियम बन सकते हैं। भाव असली होता है, नियम तो सहायता करते हैं। निजी जीवन एवं अपने चिंतन में दूरी गलती से भले रह जाए, अपेक्षित नहीं है। हां एक बात साफ कि लक्ष्य और वर्तमान के बीच क्रमबद्ध संगति होती है, सीधी नहीं। अतः यह किसी से आशा नहीं की जा सकती कि किसी भावी योजना या लक्ष्य से सहमत व्यक्ति तुरत उसी प्रकार से जीना शुरू कर दे। फिर भी क्रमबद्धता तो माननी होगी ही वरना ऐसी समझ पाखंड हो जायेगी।
आगे हम ऐसे कुछ व्यावहारिक पैमाने/कार्यक्रम पर चर्चा कर सकते हैं।
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