Wednesday, 5 April 2017

समग्रता और Cosmology

समग्रता और Cosmology
हम जिस समग्रता की बात कर रहे हैं, वह निरपेक्ष नहीं है। भारत के लोगों को भी अनादि और अनंत की सीमा का पता है। सरल सच तो यही है कि अपनी सीमा के ज्ञान से और उसके निरंतर बड़े होते जाने से एक संभावना बनी रहती है कि यह सीमा बढ़ती जायेगी और इसे पूर्णतः स्थिर कर पाना संभव नहीं है। इसीसे तो हम अनादि अनंत की समझ बनाते हैं। इसके साथ एक आरंभ विंदु और एक समापन विंदु भी कुछ समय के लिए तय करते हैं। इसमें कोई बड़ी उलझन नहीं आती।
उलझन तो तब शुरू होती है जब हम ज्ञान और संभावना को स्थायी तौर पर स्थिर कर देते हैं। व्यावहारिक जीवन में सबका अनादि और अनंत अलग होता है। मलबूरी में हमें चाहे आज के सायंटिस्ट हों या पहले के ज्योतिर्विद या अन्य प्रकार के ज्ञानी लोग अथवा सत्ताधारी लोग अनांदि-अनंत के बाद के आरंभ विंदु उसके बाद सृष्टि, प्रलय, स्वर्ग, नरक, अंतरिक्ष आदि अनेक बातों को मान कर चलना पड़ता है। ठीक है, समाज में जीने के लिए एक हद तक समाज पर भरोसा भी करना होगा और धोखा भी खाना होगा। इस हाल में अनादि-अनंत के बीच इस संसार, लोक, भुवन आदि नामों से बतायी या कही गयी संसार की समझ के साथ हम संसार में जीते हैं। संसार के विभिन्न घटकों के साथ विभिन्न प्रकार के संबंध जीते हैं।
आज की पीढ़ी ही नहीं पिछली पीढि़यों के कुछ लोग भारत के संदर्भ में जान बूझ कर एक बात की अनदेखी करना चाहते हैं कि लोक-परलोक सब मिला कर संसार की जो समझ और विश्वास है, वह भारत में एक प्रकार की नहीं है। हमारी बड़ी भारी उलझन है कि हम विभिन्न प्रकार की Cosmology के साथ जीते हैं। कोई स्वर्ग मानता है कोई नहीं मानता। आत्मबोध/अस्तित्व रूपी जीवन की दृष्टि से कोई स्वर्ग को अंतिम मानता है कोई बीच का पड़ाव। इस विश्वास के अंतर के कारण लोगों की जीवन शैली और उनकी प्राथकिताओं में भी अंतर आ जाता है। यह उक बड़ा उदाहरण हुआ ऐसे कई मामले हो सकते हैं।
जब हम भारतीय समग्रता की बात करेंगे तो किसी एक Cosmology के खांचे को ही पूरी तरह तथ्यात्मक या प्रमाणिक या मान्य नहीं कह सकते। हमें सभी प्रकार की Cosmology को स्वीकार ही नहीं करना होगा बल्कि उनके बीच पूरकता तथा  सौहाद्र के सूत्र भी निकालने होंगे साथ ही विरोध के विंदुओं पर साफ तौर पर समझौते के उपाय भी तलाशने होंगे। धर्म, सभ्यता, भाषा, संस्कृति संबंधी अनेक उलझनें इससे जुड़ी हुई हैं। समग्रता उसके बगैर कैसे होगी? हम इससे भाग नहीं सकते। यह काम तो हमें करना ही है।

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