Wednesday, 5 April 2017

समग्र स्वराज की समझ और उसकी जरूरत

समग्र स्वराज की समझ और उसकी जरूरत

आज हम एक विचित्र दौर से गुजर रहे हैं। इसमें आपाधापी मची हुई है। लोगों  को फुरसत नहीं है, जरा सा भी रुक कर कुछ सोचने-समझने का, कि हम जा किधर रहे हैं। सभी स्पर्धा में हैं लेकिन यह सोचने की जरूरत नहीं कि यह स्पर्धा कितनी असली, कितनी नकली है। बेचैनी छायी हुई है, तनाव से उत्पन्न अनेक मनोरोग बढ़ रहे हैं। चिकित्सा के नाम पर ठगी और लूट है। हर आदमी असुरक्षित महसूस करता है, वह भी पता नहीं किस किस से? मित्र शत्रु की पहचान मिट रही है। परिवार नामक संस्था पर रोज आक्रमण है, चारो ओर से, इसमें सभ्यता-संस्कृति समझें तो कैसे?
प्रेम करना मना है। राज्य, धर्म और बाजार तीनों के प्रतिनिधि सावधान हैं कि कहीं प्रेम, शांति और सुख की ओर समाज का आकर्षण बढ़ न जाए। उनका कहना है कि आप नासमझ हैं, अतः वे ही केवल तय कर सकते हैं कि आप किससे प्रेम करेंगे। यदि ऐसा नहीं किया तो निंदा, गाली-गलौज से ले कर मौत तक की सजा सुनाई जा सकती है।
उनका यह भी कहना है कि आप उन पर चुपचाप आंखमूंद कर भरोसा करें। जरा भी दिमाग क्यों लगा रहे हैं? व्यर्थ में तनाव क्यों ले रहे हैं? आजादी आपको इसलिए मिली है कि आप अपना प्रतिनिधि चुन कर निश्चिंत हो सकें न कि उसके पीछे पड़े रहें या भला-बुरा कहें। बाजार में जो माल आए, उसे खरीदिए और भोग कीजिए। बाजार के पास हर समस्या का समाधान है, वैसे ही जैसे सायंस एवं टेक्नोलोजी के पास।
भारत में अजीबोगरीब राजनैतिक समूह हैं, जो अपने को राजनैतिक दल कहते हैं। कब किसकी विचारधारा किस हद तक बदल जाए इसका पता नहीं, कब कौन किस दल में चला जाए, किस कारण चला जाए, आप बस अंदाजा लगाते रहें। ऐसा करना उनके लिए जायज है। आपने यदि उनकी बात नहीं मानी तो आप असहिष्णु, देशद्रोही, जातिवादी, सांप्रदायिक, नास्तिक, धर्मांध, रूढि़वादी और कुछ न सही, विकास विरोधी तो जरूर कहे जाएंगे।
आप शांतिप्रिय या मध्यमार्गी अथवा सामंजस्य पूर्ण जीवन शैली नहीं चुन सकते। समग्रता मे सोचना तो भारी दुस्साहस है। यह तो कुछेक लोगों या उनके पसंदीदा विशेषज्ञों का काम हैं, जो बाजार, नीति, धर्म, चुनाव, समाज परिवार सबको नियंत्रित करने का काम करते हैं।
यह जो संक्षिप्त सूचना रखी गयी। इससे स्पष्ट है कि हम गुलामी मजबूरी और निरंतर उलझते जाने वाले रोग की जकड़ में कैद होते जा रहे हैं। ऐसी पक्की घेराबंदी है कि कुछ लोग लगभग हर बार जीतते हैं और आम आदमी हर बार हारता है। ये तो वर्तमान रोग के कुछ लक्षण हैं। पूरा विवरण बहुत लंबा हो जायेगा। उसके पीछे के कारणों की पड़ताल और गहरी तथा विस्तृत हो जायेगी।
तो इससे क्या? इलाज अब नहीं तो कब ? इसलिए रोग के कारणों तक भी जाना पड़ेगा और उसके निवारण के लिए जरूरी सभी उपाय भी करने होंगे। कुछ लोग इस मयाावी मकड़ जाल को देख कर ही डर जाते हैं। कुछ लोग पिछल्ी गुलामी के प्रभाव से इतने मुग्ध हैं कि योरप के रेनेसां से पहले उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता और भारत की भी हर समसया का समाधान योरप के ही किसी न किसी फार्मूले से करना चाहते हैं।, चाहे वे धुर वाम पंथी हों या धुर दक्षिण पंथी। लोगों को बेवकूु बनाने के धंधे ही ज्ञान के पैमाने होते चले जा रहे हैं। प्रबंधन में कामाई बहुत है, अन्य पेशे से और दलाली,, जिसे लौबयिंग, लायजनिंग वगैरह अनेक नाम दिये जाते हैं , उनकी कमाई का क्या कहना?
ऐसे में यदि आपको लगता है कि आप समग्रता में सोचने समझने की हिम्मत जुटा सकते हैं। अपने ज्ञान एवं अनुभव से हमारी समग्रता की सीमा को बढ़ा सकते हैं। कुछ सीख और सिखा सकते हैं और यह सब अपनी कीमत पर कर सकेते हैं तो आपका स्वागत है। हम भारतीय लोग हैं, हमें प्राथमिकता क्रम में पहले भारतीय लोगों से बात करनी है अतः हमें देशी बिबों एवं मुहावरों में आपके ज्ञान की जरूरत है, जो हमें और हमारे समाज के लोगों की समझ में आ सके।
चर्चा की शुरुआत के लिए हमने कुछ आरंभ विंदु प्रस्तावित किये हैं। आप भी जोडि़ये, केवल काटिये नहीं, न ही किसी आदर्शवादी घिसे-पिटे माडल की जिद ठान कर झगड़े के लिये बात कीजिये। विश्लेषण और सूचना के संदर्भ में मुख्यतः योरोपीय या विदेशी संदर्भों में तो हम भी योरोपीय या अन्य विदेशी बिबों में बात को समझने के लिये सहमत हैं लेकिल देशी समस्या का समाधान देशी परिस्थिति में ही हो सकती है, इसमें हमें कोई भ्रम नहीं है। हमारी विविधता हमारी पहचान है। यह कोई नयी नहीं है। हमें सोचना और पता लगाना चाहिए कि पहले इस देश के लोगों ने देशी एवं विदेशी व्यापार तथा सामाजिक संबंध कैसे रखे और वर्तमान में क्या संभव है।
माडर्न सायंस या टेक्नेलोजी हमारे लिए होनी चाहिए न कि हमें उसकी बलि वेदी पर शहीद होने की जरूरत है। हम विकास चाहते हैं, सचमुच में, समग्रता में। देश के विकास का मतलब किसी भी हाल में देश की बड़ी आबादी से अलग नहीं हो सकती है। आंकड़ों की बात करें तो वे प्रगट और समझ में आने लायक होने ही चाहिए।

No comments:

Post a Comment

Note: only a member of this blog may post a comment.