Vagish K Jha मैं आपकी बात के मूल भाव से सहमत हूँ, पाठक जी। एक समग्र जीवन दृष्टि की तलाश हर समय की नई और ज़रूरी तलाश होती है। और इसकी रूपरेखा अध्यवसाय, सामाजिक कर्म और व्यापक संवाद से ही बनती है। मेरे लिए यही राजनीति है, एक उस समग्र दृष्टि की सामूहिक तलाश जो व्यापक कल्याण का रास्ता न्याय और नैतिक आधार पर खड़ा हो। ये तमाम शब्द आज खतरे में हैं और हर काल में इनको नए अर्थ देने की ज़रूरत होती है। इस खोज के क्रम में संस्कृति का समीचीन अर्थ भी उभरता है। यहां मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि संस्कृति मेरे लिये कोई वैचारिक जीवाश्म या fossil नही बल्कि एक जीवंत आग्रह है जो अतीत से प्रेरणा तो लेता है लेकिन भविष्य की ओर मुखातिब होता है। ऐसे में संस्कृति का काम शब्दों को आज के संदर्भ में नए अर्थ देना भी होता है। गांधी ने सत्य और अहिंसा का जो अर्थ प्रतिपादित किया वो उस समय के लिए एक नया अर्थ था। संवाद की ईमानदार प्रक्रिया ही इस अर्थ को प्रतिपादित करने एक प्रभावी तरीका है। यहां संवाद केवल विद्वानों की मंडली के साथ होने वाली बातचीत से आगे, अपने समय और समाज के साथ का संवाद है। इस तरह मैं ज्ञान और व्यवहार के द्वैध को भी नही मानता। इन दोनों के बीच भी एक सतत संवाद चलता है जिसको सुनने का विवेक और इसमें शामिल होने की विनम्रता पैदा कर पाना एक बड़ी चुनौती है। ऐसा भी नही कि आप या हम इसकी एक नई शुरुआत करने का प्रस्ताव लेकर आये हैं। यह तो शुद्ध अहंकार होगा। संवाद चल रहा है, लगातार। इस यज्ञ में हम भी एक होता की भांति शामिल हों, पुरोहित बनने का दम्भ त्याग कर तो फिर यह समाज कल्याण का यज्ञ हो सकेगा। हम सब जो अपने स्तर पर ऐसे कामों में लगे हैं, वे साथ आकर एक दूसरे की सुने तो यह बात बनाने की सही शुरुआत होगी, ऐसा मेरा मानना है। संवाद की शुरुआत तो सुनने से होती है। मैं सुनने को आतुर हूँ। जब कहें, जहां कहें...
इसे थोड़ा और स्पष्ट तथा विस्तृत रूप देने की कृपा करें।
Ravindra
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