Thursday, 13 April 2017

"भारतीय राजनीति में समग्रता" की जरुरत पर..

कोस्मोलोजी, सृष्टिबोध और राष्ट्रबोध, सामूहिकता को एक साथ लेकर चलने की जरुरत को रेखांकित करते हुए आचार्य रवींद्र कुमार पाठक के चिंतन की समग्रता शब्द का मतलब यहां वैश्विक संदर्भ में भारतीय समग्रता है। समग्रता से यहां स्वर्ग, नरक, अन्य ग्रह एवं संभावित/आशंकित वासी एवं उनकी बातें नहीं हैं।
व्यक्ति, समूह या समाज में व्याप्त/प्रचलित ऐसी बातों की सच्चाई जानने परखने के विवाद में हम नहीं पड़ना चाहते। हमारे लिए ऐसी बातें या तो विश्वास हैं या जाँच/परख के अभी अधीन ही चल रही हैं।
ऐसी बातें परस्पर संबंधों को प्रभावित करने वाली नहीं हों, इतना काफी है। व्यक्ति के मन के भीतर संस्कार, स्मृति आदि के रूप में भी बहुत सारी लोक-परलोक संबंधी बातें हैं। ध्यान के समय लोगों को उनके साक्षात्कार भी होते हैं फिर भी किसी एक व्यक्ति का अनुमान या विश्वास के संभावना बताता है, निर्णय नहीं। जब कोई अनुभव अनेक लोगों को होने लगे तब वह सामाजिक तथ्य बनने लगता है, तब उस पर भी विचार हो सकता है।
ज्ञान की आधुनिक भूख भी कई बार नितांत व्यक्विादी, अति विश्लेषक, नीति एवं प्रकृति के निरपेक्ष होने लग रही है। यह जुड़ाव की प्रक्रिया में बाधा पैदा करती है। स्वयंभू महानता भले ही वास्तविक हो लेकिन उसे समाज पर अपना वर्चस्व लादने का हक नहीं है। वह महानता समाज द्वारा स्वीकृत होगी तभी उसकी सामाजिक स्वीकार्यता हो सकती है। ऐसे महान व्यक्तियों को भी समय से संवाद करने का हक होना चाहिए और यदि उसकी कोई खाशियत समझ में नहीं आ रही हो तो सहसा उसके जीवन एवं संवाद पर आक्रमण उचित नहीं है, चाहे वह किसी भी प्रकार का खोजी या आविष्कारक हो, धर्म, अर्थ, सायंस, टेक्नोलोजी किसी भी मामले में।
लेकिन समग्रता की बात यहीं ख़त्म नहीं होती वैश्विक सन्दर्भों में समग्रता की अन्य चुनौतियाँ भी हैं|  समन्वय से जुड़े आईआईटी दिल्ली के पूर्व छात्र पवन कुमार गुप्ता लिखते हैं कि समग्रता या integration की बुनियाद में integrity और authenticity होती है। ईमानदारी। कोई छोटी-मोटी, लेन-देन वाली ईमानदारी नहीं, अंदर की ईमानदारी। दूसरों को दिखाने वाली से ज़्यादा अपने से ईमानदारी। अपने पूर्वाग्रहों और पूर्वामानों के प्रति भी सजगता की मांग होती है इसमे। न दक्षिन्पंथियों वाली और न ही वामपंथियों वाली बेइमानी इसमे नहीं चल सकती। दोनों ही लेन देन के मामले में ईमानदार माने जाते हैं!
दूसरी बात समग्रता, बगैर सनातन (देश काल से परे) सिद्धांतों के होती नहीं। सनातन और सामयिक में बुनियादी यही है कि सनातन समग्रता लिए हुए ही होता है, कटा हुआ नहीं। और सामयिक काँट-छांट के बिना, बिना कुछ पहलुओं को नज़रअंदाज़ किए चलता नहीं। इसमे कुछ पहलुओं को तवज्जो देनी पड़ती है और अन्यों की उपेक्षा। यह सामयिकता की ज़रूरत है। कार्य और व्यवहार दोनों ही सामयिक होते है। फर्क सिर्फ यह हो सकता है कि निर्णय लेते वक्त हमने सनातन को केंद्र में रखा है या उसकी अनदेखी कर दी है।
राजनीति में यही खोट आ गया है कि उसमे सनातन की उपेक्षा होने लगी है। इसीसे फिर वोट की राजनीति, ध्रूविकरण की राजनीति इत्यादि निकलते हैं। इसी से आज के तथाकथित आध्यात्मिक गुरुजन निकलते हैं। मीडिया, बाज़ार और टेक्नोलोजी का गठजोड़ इसको हवा और वेग देता है। इसीमें अर्थ से हट कर (खोखले) शब्द हावी हो जाते हैं। अगर सनातन का ध्यान नहीं रखा जाएगा, बावजूद सामयिक मुद्दों के जबरदस्त दवाब के, तो हमारी राजनीति को भी सामयिकता निगल लेगी। सामयिकता में मुख्यधारा की भयंकर ताकत होती है।
"पॉलिटिक्स ऑफ़ इंटीग्रेशन" के फेसबुक पेज की परिचर्चा से

No comments:

Post a Comment

Note: only a member of this blog may post a comment.