काल के प्रवाह में एक से एक अच्छी बातें अनुपयोगी हो जाती है। अनेक महान व्यक्तियों, परंपराओं एंव संस्थाओं के देश में उनके बीच संगति बैठाने की उलझन भी रहती ही है।
ऐसे में कई बार पुरानी या वर्तमान महानता न ठीक से समझने देती है न संगति बैठाने देती है। मेरी समझ से ऐसी महानताओं से डरने की जरूरत नहीं है बल्कि उसे ठीक से समझने की जरूरत है। एक गजब किश्म की मानसिकता है कि हमारे ग्रंथ, महापुरुष और परंपराएं इतनी महान हैं कि उन पर सवाल उठाना तो दूर वे तो समझी ही नहीं जा सकतीं ? वेद हो या त्रिपिटक, उसे पढा न जाए तब क्या किया जाये। केवल कुछ लोगों के वक्तव्यों को मान लिया जाये। शायद कुरान और बाइबिल के साथ भी ऐसा ही है। चलन में तो यही दिख रहा है कि केवल कुछ लोगों के वक्तव्यों को मान लिया जाये।
यह बीमारी दुर्भाग्य से भारतीय संविधान तक पहुंच गयी। हमारा संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान बना। अब जरा पता करके देख लें कि च्वसपजपबंस ैबपमदबम में च्ीण्क्ण् करने वाले कितने लोगों ने भारतीय संविधान के मूल को देखा भी है, भले ही उन्होंने भारतीय संविधान पर अनेक लोगों की अनेक व्याख्याएं पढ़ी हों।
इस प्रकार महानता का भय भी हमें जुड़ाव की प्रक्रिया से रोकता है। पुनर्विचार की नयी संभावनाओं से रोकता है कि कहीं किसी महान विचार, संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध तो बात नहीं गयी।
भारत में गांधी और मार्क्स नये जमाने के चर्चित नाम हैं। राजनीति वाले लोग इनका नाम खूब लेते हैं। इसके अनुयायी होने के अनेक दावेदार हैं।
एक पक्ष कहता है- बंदूक के बगैर सत्ता नहीं, सत्ता के वगैर परिवर्तन नहीं। परिणाम भी सामने हैं। गांधीवादी सत्य, अहिंसा की बात करते हैं। कांग्रेस से समाजवाद, सर्वोदय तक की यात्रा में कितनी अहिंसा, सत्य आदि बचा है, इससे ये सभी स्वयं सहमत नहीं है। एक जगह अपने को असली कह कर दूसरे का गला काटा जाता है दूसरी जगह परस्पर निंदा और असंवाद तक के झगड़े हैं। मतलब मार्क्स एंव गांधी के कुछ सपने थे, कुछ सिद्धान्त थे। कुछ समाज में आये कुछ सामाजिक धरातल उतर नहीं सके। यदि आंशिक रूप से उतरे भी तो वह पर्याप्त नहीं है।
अब यदि हम समीक्षा ही न करें तो सुधार या नया निर्णय हो कैसे? ऐसी महान परम्परा और उसकी संस्थाएं पुरानी बेडि़यों से कम दर्दनाक थोड़े ही बनती जा रही हैं। केसे समझें कि कौन असली कौन नकली?
"पॉलिटिक्स ऑफ़ इंटीग्रेशन" के फेसबुक पेज से आचार्य रवींद्र कुमार पाठक का अभिकथन
ऐसे में कई बार पुरानी या वर्तमान महानता न ठीक से समझने देती है न संगति बैठाने देती है। मेरी समझ से ऐसी महानताओं से डरने की जरूरत नहीं है बल्कि उसे ठीक से समझने की जरूरत है। एक गजब किश्म की मानसिकता है कि हमारे ग्रंथ, महापुरुष और परंपराएं इतनी महान हैं कि उन पर सवाल उठाना तो दूर वे तो समझी ही नहीं जा सकतीं ? वेद हो या त्रिपिटक, उसे पढा न जाए तब क्या किया जाये। केवल कुछ लोगों के वक्तव्यों को मान लिया जाये। शायद कुरान और बाइबिल के साथ भी ऐसा ही है। चलन में तो यही दिख रहा है कि केवल कुछ लोगों के वक्तव्यों को मान लिया जाये।
यह बीमारी दुर्भाग्य से भारतीय संविधान तक पहुंच गयी। हमारा संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान बना। अब जरा पता करके देख लें कि च्वसपजपबंस ैबपमदबम में च्ीण्क्ण् करने वाले कितने लोगों ने भारतीय संविधान के मूल को देखा भी है, भले ही उन्होंने भारतीय संविधान पर अनेक लोगों की अनेक व्याख्याएं पढ़ी हों।
इस प्रकार महानता का भय भी हमें जुड़ाव की प्रक्रिया से रोकता है। पुनर्विचार की नयी संभावनाओं से रोकता है कि कहीं किसी महान विचार, संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध तो बात नहीं गयी।
भारत में गांधी और मार्क्स नये जमाने के चर्चित नाम हैं। राजनीति वाले लोग इनका नाम खूब लेते हैं। इसके अनुयायी होने के अनेक दावेदार हैं।
एक पक्ष कहता है- बंदूक के बगैर सत्ता नहीं, सत्ता के वगैर परिवर्तन नहीं। परिणाम भी सामने हैं। गांधीवादी सत्य, अहिंसा की बात करते हैं। कांग्रेस से समाजवाद, सर्वोदय तक की यात्रा में कितनी अहिंसा, सत्य आदि बचा है, इससे ये सभी स्वयं सहमत नहीं है। एक जगह अपने को असली कह कर दूसरे का गला काटा जाता है दूसरी जगह परस्पर निंदा और असंवाद तक के झगड़े हैं। मतलब मार्क्स एंव गांधी के कुछ सपने थे, कुछ सिद्धान्त थे। कुछ समाज में आये कुछ सामाजिक धरातल उतर नहीं सके। यदि आंशिक रूप से उतरे भी तो वह पर्याप्त नहीं है।
अब यदि हम समीक्षा ही न करें तो सुधार या नया निर्णय हो कैसे? ऐसी महान परम्परा और उसकी संस्थाएं पुरानी बेडि़यों से कम दर्दनाक थोड़े ही बनती जा रही हैं। केसे समझें कि कौन असली कौन नकली?
"पॉलिटिक्स ऑफ़ इंटीग्रेशन" के फेसबुक पेज से आचार्य रवींद्र कुमार पाठक का अभिकथन
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