Thursday, 13 April 2017

पहचान का सवाल : समग्रता और जुड़ाव की राजनीति कैसे हो?

"Politics of Integration" (पॉलिटिक्स ऑफ़ इंटीग्रेशन) के फेसबुक पेज पर हुई चर्चा में श्री वागीश जी ने ध्यान दिलाया है। उस पर आचार्य रवींद्र कुमार पाठक का अभिकथन---
राजनीति से यहां मेरा अभिप्राय उन सारी समझ एवं क्रियाकलापों से है, जो समाज की व्यापक समस्याओं को समझने एवं उनका समाधान ढ़ूँढ़ने के लिए जरूरी हों।
जब समस्याएं ही अनेक हों और आपस में गुंथी हुई सी हों तो मेरे जैसा साधारण आदमी पीड़ा भले महसूस करे, सीधा-सपाट तुरंत फुरंत वाला समाधान कैसे दे या राजनीति की परिभाषा कैसे दे ? परिभाषा तो पूरी तरह बंधी होती है। परितः चारो तरफ से भाषित वर्णित, वह होती है परिभाषा। एक अक्षर न कम, न अधिक। मजबूरी में कुछ लक्षण बता सकता हूँ। लक्षण मतलब पक्की पहचान, परिभाषा नहीं।
राजनीति की पक्की पहचान है सत्ता/सामर्थ्य अंग्रेजी की पॉवर  जैसी, उसका सृजन, उपयोग और उसकी रक्षा। परिवार एवं समुदाय के अधिकार आज राज्य की संप्रभुता के सिद्धांत के समक्ष विलीन, विस्मृत या लुप्त जैसे हो गये हैं।
भारत में धर्म का एक दायरा चूँकि राज्य से बड़ा रहा है। अतः ऐसी सत्ता सामर्थ्य को राजनीति कहा जाने लगा। राजा, राज्य और धर्म के बीच आपसी संघर्ष भी रहा, यही हाल अर्थ सत्ता सामर्थ्य की सृजन, उपयोग और संरक्षण का रहा। भारतीय धर्म की एवं आर्थिक गतिविधियां पहले भी केवल भारत तक सीमित नहीं थीं। अतः राजनीति शब्द के अर्थ को केवल राज्य या राजा की सीमा तक रोका नहीं जा सकता। वैसे भी हर स्थान पर राज्य एवं शासन का कोई न कोई रूप होता ही है, चाहे वह परिवार जैसी छोटी इकाई क्यों न हो, यदि अराजकता न फैली हुई हो।
संक्षेप करें तो मतलब निकला कि हर प्रकार के सत्ता सामार्थ्य का मानवीय सृजन, उपयोग और नियंत्रण।
शब्दों की भारी दिक्कत है। करूं तो क्या करूं अंग्रेजी-हिन्दी में मेल नहीं बैठते। खैर, मेरे कहने का आशय यह है कि जुड़ाव भी कई प्रकार के होते हैं लेकिन अपनी पसंद का जुड़ाव परस्पर पूरकता, विस्तार एवं अनुकूलता वाला है। युद्ध या विध्वंसक जुड़ाव नहीं। वह तो मजबूरी है।
एकता, जुड़ाव जो कहें, इसमें अनुकूलता-प्रतिकूलता के दो प्रमुख कारण हैं- पहला प्राकृतिक परिस्थिति, दूसरा अपनी पहचान और उस पहचान में दूसरे का स्थान। अपनी पहचान में परिवार के सदस्यों से लेकर विश्व के अन्य मनुष्य, जीव-जन्तु, जड़-चेतना, जिस किसी के लिए जो स्थान तथा संभावना निर्धारित होगी हमारा सहज व्यवहार वैसा ही होगा। उसमें अनुकूलता, शांति सुख महसूस होगा। हो सकता है मजबूरी में या षडयंत्र/कपट के समय हमारा व्यवहार भिन्न लगे किन्तु हम लौट-लौट कर अपनी पहचान पर आयेंगे और उसी के अनुरूप जीने तथा सृष्टि का प्रयास करेंगे।
इसलिए सत्ता संघर्ष में पहचान एक बड़ा मुद्दा होता है। यह व्यक्ति को मानसिक रूप से प्रभावित तथा नियंत्रित करता है। इसे विस्तार से समझने की जरूरत होगी कि कैसे पहचान के साथ छेड़छाड़ की जाती है। बिना युद्ध भी अनेक भले-बुरे काम मात्र इसी उपाय से हो जाते हैं। इसलिए नई पहचान बनाने, पुरानी पहचान बचाने, दूसरे की पहचान बदलने या न बदलने देने के प्रयास राजनैतिक चर्चा के स्थायी मुद्दे हैं।
इसके बाद समझने में थोड़ी सुविधा होगी कि हमारी अनेक पहचानें कैसे हमें भीतरी और बाहरी दोनों स्तरों पर उलझाती, विखंडित करती हैं। हमारी इस कमजोरी का दूसरे कैसे लाभ उठाते हैं। व्यक्ति से ले कर समुदाय, जाति, धर्म, सम्प्रदाय वगैरह सभी जगह यह समस्या है।
एकता की राजनीति की दिशा ऐसी पहचानों को चुनना तथा समर्थन करना भी है,जो परस्पर संगति, संरक्षण, स्नेह एवं एक सीमा के बाद स्वतंत्रता भी देती हो। भारत में पहचान से मुक्ति भी जीवन के गंभीर एवं महान लक्ष्यों में एक है। फिर भी भारतीय समाज ने पहले कितना संगत बनाया कि ठीक है,  आप अपनी पहचान से मुक्त होकर जीने की भी कोशिश कर लें लेकिन आप समाज विरोधी या हिंसक नहीं हो सकते। यदि अनुत्पादक भी रहेंगे तो भी समाज आपकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति का जिम्मेवारी ले लेगा और भारत में आपके इस संकल्प के कारण कम से कम आपकी हत्या तो नहीं होगी। आप ईश्वर, वेद, देवता, धर्म, राजा किसी से असहमत हो सकते हैं।

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