बात है समग्रता की राजनीति की... भय,
षड़यंत्र और संवाद की| कथ्य है कि समग्रता की राजनीति में इन तीनों स्तरों पे एक साथ काम करना होगा| इस
चिंतन की बुनियाद सिर्फ इतने पर है कि क्या आम आदमी के दिमाग की उलझनें, उसकी
जीवन चुनौतियाँ और बुनियादी जरूरतें असली मामला है या कुछ और...| वैश्विक
सन्दर्भों में राष्ट्र, राज्य की अवधारणा में इन जरूरतों और चुनौतियों के सूत्र क्या
हैं? आम आदमी के दिलो-दिमाग के विचार भावनाओं का मूल्य
कितनी अहमियत रखता है? मानवीय भावनाओं का कितना ख्याल रखा जा रहा है| नगर
ग्राम की व्यवस्था में, प्रकृति परिवेश की व्यवस्था में, हमारे
पास राजकाज के सूत्र हैं... संवाद भयऔर षड़यंत्र| इसी से
बुनियादी अवधारणाओं का व्यावहारिक निर्माण संभव होता है| इन्ही
तीन सूत्रों से व्यक्ति, समाज और संस्थान की बुनियाद बनती है| एक
संस्थान परिवार भी है| चूंकि परिवार एक
शिशु को पैदा ही नहीं करता, वह रक्षा न करे तो
शिशु मर जाए अतः पूर्ण वयस्क होने तक परिवार का निर्णय मानना जरूरी है।
अपने को
स्वयं स्वामी, विजेता, निर्णायक, विशिष्ट मानने वाली पहचान और उस आधार पर दूसरे पर अपनी बात या
इच्छा थोपना किसी को भी मान्य नहीं होता| इसीलिए परिवार की व्यवस्था में नियम है सर्वत्र जयमिच्छंतु, पुत्रात-शिष्यात पराजय। 'हर जगह जीत की
ख्वाहिश रखो, पर बेटे और
शागिर्द से हार की। अब झगडा ख़त्म| बेटे की परवरिश तक की जिम्मेदारी उठाने के बाद उसकी सफलता पर
कौन खुश नहीं होता| यही साधारण नियम
है| इस नियम का मूलभूत
पक्ष भावनात्मक है| भावनात्मक रूप से
किसी से जुड़कर ही हम उसकी ख़ुशी और प्रगति में अपना आनंद पा सकते हैं| ये तो रही दिल के रिश्ते की बात| लेकिन राजनीति में यही नियम विरोधाभास
मालूम होता है| यहीं गड़बड़ है, यही विखंडन को जन्म देता है| व्यक्ति, समाज और संस्थान
की कानूनी और सामाजिक अडचनों का मूलभूत पक्ष यही है| कोई भी पार्टी हो, कंपनी हो या कानूनी तौर पर स्थापित एनजीओ| संस्थान में आदमी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए काम करता है| साथ ही वह अपनी मेधा और रूचि के अनुरूप अधिकारों और कर्तव्यों का भी अनुकरण और अनुसरण करता है| अब बताइए तो कि कोई शागिर्द अगर ज्ञान, साधन, और संगठन की
परिपाटी अथवा स्थापित नियमों में खुद को प्रवीण पाता है और उसे प्रगति का मार्ग
अवरुद्ध लगता है तो वह अलग क्यों न होगा? उसका बुनियादी अधिकार और कर्तव्य तो अपने और दूसरों के लिए
बेहतर करने के अवसरों और संभावनाओं में सर्वश्रेष्ठ करने के लिए हैं| ऐसे में अमुक व्यक्ति कानूनी बंधन में
या स्थापित परिपाटी में स्वयं को बंधा हुआ क्यों न मानेगा? समाज हो या संस्थान अगर व्यक्ति के साथ
अन्याय हो यही परिस्थिति भयमूलक भी हो सकती है| यही षड्यंत्र की भी
प्रेरणा हो सकती है| इसीलिए योग्यता
और रूचि के नियम हैं, शिक्षण-प्रशिक्षण
के भी| संस्थानों में
प्रगति और विकास के भी नियम हैं, प्रमोशन और कार्य संतुष्टि के लिए जो भी संगठन संजीदा होते
हैं उनका विकास तय है| क्योंकि
व्यवस्था तो वही है जिसमे बारिश हो तो सबको बराबर मिले| इन्सान हो या जानवर, पशु-पक्षी हो या पेड़-पौधे पानी तो सब
पर बराबर बरसता है|
cosmology की बात
तो सिर्फ इतनी है कि भावना और और आपसी भरोसा बना रहे| यही नियम घर की बुनियादी बात है| इसी से भावनात्मक लगाव और भाईचारा भी बढ़ता है| तो बताइए समग्रता का नियम अनिवार्य है या नहीं....?
No comments:
Post a Comment
Note: only a member of this blog may post a comment.