Thursday, 13 April 2017

जीवन तो निरंतरता और समकालीनता में चलता है...

कानपुर घोषणापत्र के सन्दर्भ में स्वराज पीठ ट्रस्ट से जुड़े गांधीवादी राजीव वोरा जी ने अपनी जिज्ञासा जाहिर की है|  
 श्रीमान राजीव वोराजी के प्रश्न पर आचार्य रवींद्र का अभिकथन ‘‘जीवन समकालीनता और निरंतरता में चलता है’’, यह हमारा कथन है। यहां हमारे कथन के सामान्य अभिप्राय निम्न हैं- 
हर मनुष्य के जीवन की एक अवधि है, जिसे ‘आयु’ कहा गया है। उस अवधि में एक निरंतरता तो प्रगट ही है। इसमें बदलाव भी है और जुड़ाव भी। दोनों मिल कर निरंतरता कहे जाते हैं। सामान्य रूप से यह खंडित होती नहीं है। मृत्यु से यह खंडित होती है। जीवन का यह सहज रूप प्रायः सभी को मान्य है। जो लोक-परलोक मानते हैं, वे भी इसे वर्तमान जीवन कहते हैं। पहले वाले को पूर्व जन्म और बाद वाले को अगला जन्म। 
समकालीनता के अंतर्गत वे सारी बातें आती हैं, जो हमारे जीवन काल के बीच काल प्रवाह के साथ-साथ रहती हैं या होती हैं, जो भी कहें। 
जन्म से मृत्यु पर्यंत परिवार, समाज, परिवेश भी रहते हैं। जैसे मनुष्य में लगातार परिवर्तन होते रहता है, वैसे उसके समकालीन विभिन्न संदर्भ, जैसे- परिवार, समाज, परिवेश आदि भी बदलते रहते हैं। हम इस सहजता को स्वीकार कर जीने में विश्वास करते हैं।
प्रश्न हो सकता है कि इसे अलग से कहने की क्या जरूरत है? उत्तर है कि आज मनुष्य आपाधापी में एवं अनेक प्रकार की आशाओं में अपने व्यक्तित्व तथा उसके विविध संदर्भ दोनो में चल रहे लगातार परिवर्तन को भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। न काल को, न अवधियों को देखने को तैयार है, न समानांतर हो रही घटनाओं को, जैसे उनसे उसका कोई संबंध ही नहीं। इसी तरह लगातार सुख के संसाधन इकट्ठे करने में उन संसाधनों से सुख भोगने का समय ही नहीं जुटा पाता। संसाधनों की दृष्टि से 2 व्यक्तियों में अंतर हो सकता है। इसी प्रकार उसकी व्यस्तता के स्वरूप में भी अंतर संभव है लेकिन जीवन रूपी अवधि के अन्य छोटे प्राकृतिक काल खंड, जैसे- दिन-रात, महीने, साल, ऋतु आदि के अनुसार शरीर एवं मन भी तो बदलता ही रहता है। वे तो सबके लिए बराबर और साथसाथ परिवर्तनशील हैं। इस सरलता को भी उपभोक्तावादी दृष्टि में झुठलाना सिखाया जाता है, जैसे कोई प्रचारक सिखाता है - ‘‘अभी अनेक जूतों का संग्रह कर लो, सस्ते हैं, बाद में अपनी मर्जी से पहनना’’। कोई सिखाता है- हमें अगले 20-25 सालों के लिए वोट देते रहो, पिछली बार भी दिया था, इस बार भी दो। चिंता क्यों हम कर देंगे।
जो राज्य एवं समाज के आदर्शवादी माडलों के सपने बेंचते हैं, वे कहते हैं। अपने विपक्षियों, प्रतिद्वंद्वियों के सफाए के बाद एक ऐसा आदर्श समाज बनेगा या बनाया जायेगा। तब तक कोई जांच नहीं हो सकती कि उस दिशा में प्रयास या सफलता मिल भी रही है या नहीं। इसमें न समकालीनता है, न निरंतरता है, न कार्यकारण संबंधों की परीक्षायोग्य क्रमबद्धता, चाहे वह माडल रामराज्य का हो या सर्वहारा क्रांति के बाद वाली सरकार का या संपूर्ण पूंजीवादी समाज-राज व्यवस्था का। इससे अलग सोच वाले भी तो हैं ही कि लोकतंत्र या स्वराज की उपलब्धि अचानक आनेवाली घटना नहीं, इसे अपने जीवन की समकालीनता में निरंतर प्रयास एवं सफलता से लाना होगा। इसके लिए उतनी ही अवधि स्वीकृत हो सकती है, जितनी के बिना यह संभव ही न हो। उदाहरण के लिए जैसे ही यह मान्य हो गया कि वयस्क होने की आयु 18 साल है। तो बस, उसके बाद मतदान करने दिया जाय और जब तक दिमाग, देह सचेत हैं, तब तक मतदान करता रहे। इस साल बाढ़ आयी है तो सरकार या मित्र या परिवार के सदस्य यह कैसे कह सकते हैं कि हम मदद अगले साल करेंगे। मुआवजे की राशि मरने के बाद दी जायेगी।
निजी तौर पर समय पर पोषण, शिक्षा, विवाह, प्रजनन एवं अन्य कार्याें की आवश्यकता तथा औचित्य की जांच ‘‘समकालीन निरंतरता’’ की कसौटी पर आसानी से हो सकती है। हमने इसी समझ एवं संदर्भ में मूलतः इन दोनो शब्दों का प्रयोग किया है। 
वैसे अनुभवी विद्वान एवं चिंतक इसका अन्य विस्तार भी बता सकते हैं, जैसे जीवन के लक्ष्य की दृष्टि से, या निर्वाण, मुक्ति आदि की दृष्टि से या फिर कालातीत आदि बनने की साधना की दृष्टि से। 
इसी सन्दर्भ में राकेश मिश्र का कथन है कि समकालीनता और निरंतरता संवाद प्रक्रिया का कालगत निर्णय है| जिम्मेदारी के भाव का अनुशासन है, यूँ कहें कि कर्त्तव्य बोध है| दृष्टा का अनुमान आकलन एवं देश काल परिस्थितियों की समग्रता अलग है| इसलिए कालगत निर्णय भी अलग है| दृष्टा की प्राथमिकता उसके परिवार, परिवेश, प्रवृत्ति, प्रशिक्षण और अनुभवों के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है| उसकी निरंतरता भी एक यथार्थ है जिसको वह जीता है| समकालीनता में यह कालगत निर्णय तमाम सामानांतर धाराओं की सामूहिकता है| व्यक्तिगत स्तर पर कहें तो रिश्ते-नाते, दोस्ती-यारी, पार्टी-क्लब, इत्यादि, इत्यादि| खानाबदोशी में इसकी स्थिति अलग-अलग बनती-बिगडती है| यहाँ देश काल और परिस्थितियों का आकलन अनिवार्य रूप से समकालीनता तो है लेकिन उसके साथ जुड़ाव और जिम्मेदारियां घटती बढती हैं| यह सब ऐच्छिक और अनैच्छिक दोनों रूप से संभव है| चयन भले ही अपनी इच्छा से करें लेकिन समदर्शी दृष्टा लोग सामाजिक होते हुए सबसे रूबरू होते हैं, | आपात स्थिति भी संभव है, उसका भी ख्याल करना होता है| नियम-धर्म, नीति-निर्णय, व्यवहार आदि किसी दृष्टा के कालगत निर्णय ही तो हैं| लेकिन दृष्टा राष्ट्रपुरुष या स्टेट्समैन होता है तो यह दृष्टि समूहों की प्रत्याशा और भावनात्मक एकता की अखंडता के मानक से निर्दिष्ट होती है| संविधान वर्तमान में भारत के नागरिक जीवन का दिशा निर्देशक है, राष्ट्रपुरुष के लिए संविधान के अनुरूप यथोचित व्यवहार अनिवार्य है, क्योंकि वह उसका प्रतीक है| उसकी समकालीनता और निरंतरता में ऐसे हजारों अवयव शामिल हैं जिनकी निरंतरता और जिम्मेदारी उसकी जिम्मेदारी बनती है| यही जिम्मेदारी और कर्त्तव्य बोध की राजनीति विखंडित होती जा रही है| यह गिरावट है| एक दृष्टि से निरंतरता नागरिक जीवन की मध्यम गति का सूत्र हो सकता है, तो समकालीनता समूह के समग्र रूप का दृष्टिबोध|

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